प्राचीन भारत में वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी

short info :- प्राचीन भारत में विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित उन्नत रोगी की प्रौद्योगिकी मौजूद थी अनेक उदाहरण हैं मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में प्राप्त भवन निर्माण तकनीक और नगर योजना मृदभांड तकनीक वस्त्र निर्माण तकनीक धातु करण आभूषण और हथियार निर्माण तकनीक कृषि कर्म तकनीक मूर्ति निर्माण तकनीक,

आदि के प्रमाण फिर दिल्ली भुवनेश्वर कोणार्क आदि स्थानों पर सदियों से अजय खड़े लौह स्तंभ रामपुरवा का अशोक स्तंभ सुल्तानगंज में प्राप्त से दिल्ली बुद्ध की पांचवी सदी की ताम्र मूर्ति औषधि के रूप में प्रयुक्त विभिन्न धातुओं की बस में अजंता के विभिन्न भित्ति चित्रों में प्रयुक्त आज भी जीवन तरंग शास्त्रों में वर्णित अंतर सत्रीय यात्राएं रामायण में,

वर्णित इच्छाधारी पुष्प विमान रामायण महाभारत ग्रंथों में वर्णित यंत्र चालित विशाल नाव काय रामायण और महाभारत में वर्णित युद्ध में उपयोग में लाए गए अस्त्र-शस्त्र ऋषि दुर्वासा का पीछा करता सुदर्शन चक्र गाइडेड मिसाइल की संकल्पना संजय द्वारा महाभारत युद्ध का आंखों देखा हाल सुनाना आदि किन्ही कुछ विषयों में से हमने जो लोकप्रिय प्रौद्योगिकी है उनके ऊपर आज चर्चा करने की कोशिश की है।

धातु कर्म तकनीक :-

प्रमाण है कि 3000 वर्ष पहले सिंधु घाटी सभ्यता के समय भी भारत में धातु विज्ञान और तकनीक का पर्याप्त ज्ञान था उस समय के लोग लोहे के अतिरिक्त तांबा पीतल दिन सोना चांदी भारत आदि धातुओं के उत्पादन की तकनीक से पूरी तरह परिचित है।

शतपथ ब्राह्मण में बताया गया है कि सुमन सिंधु आदि नदियां में बहने वाली रेत से प्राप्त किया जाता था शतपथ ब्राह्मण ने ही शीशे को नरम धातु और तांबे को लाल धातु कहा गया है।

वैदिक साहित्य में धातु कर्म से जुड़े 150 वर्ग के कारीगरों का वर्णन मिलता है पतंजलि ने महाभारत में धातु कारीगरों के 4 वर्ग बताएं आयशर आयशर आने वाले लॉकर लोहार स्वर्णकार सुनार और 10 करने का 

मध्य प्रदेश की अंगड़िया जनजाति के लोग सदियों से लोहा लोहा अयस्क को कोयले के साथ बेलना कार भर्तियों में गला कर बनाते हैं

दिल्ली में कुतुब मीनार के पास लगा लो स्तंभ संग्रहित आश्चर्य कहा जाता है संभवत इसे समुद्रगुप्त ने बनवाया था कहां जाता है 23 फुट 8 इंच ऊंचा या स्तंभ शुद्ध लोहे से 20 30 किलो के गर्म टुकड़ों को जोड़ जोड़ कर बनाया गया है,

आश्चर्य इस बात का है कि उस समय में भी लगभग 16 सदी पहले दो टुकड़ों को एकदम सफाई से जुड़ने की तकनीक भारत में मौजूद थी आज भी उसमें किसी जोड़ का चिन्ह दिखाई नहीं पड़ता।

राजस्थान के जावर स्थान में ढाई हजार साल पुरानी जस्ते की खाने विनती है प्रमाण बताते हैं कि यहां विपरीत आसवन विधि से जस्ता बनाया जाता था ज्ञातव्य कीचड़ से को पिघलाने MP3 एक जटिल तकनीकी काम है।

तो किसका कांता पर एक बार में परिवर्तित हो जाता है कहा जाता है कि भारत में ही जचता निर्माण की तकनीक चीन और यूरोप को मिली

इसी तरह खुदाई में प्राप्त पीतल और कांसे के उपकरणों को काल निर्धारण इससे तीन या चार हजार पूर्व प्रचलित हुआ है अर्थात भारत में उस समय मिश्र धातु बनाने की तकनीक मौजूद थी

नौका प्रौद्योगिकी :-

भारत नाविकों का देश रहा है शताब्दियों पहले महर्षि अगस्त्य ने 9 गांव से दूर दूर देशों की समुद्री यात्राएं की इसी तरह महर्षि तंबू और कौन डिलीवरी समुद्री मार्ग से दक्षिण पूर्व एशिया पहुंचे थे सौराष्ट्र में लोथल नगर की खुदाई से पता चला कि 5000 वर्ष पहले हुआ था महाभारत काल में उल्लेख है।

कि भरूच एक उत्तम बंदरगाह था रामायण में अयोध्या कांड में ऐसे बड़ी-बड़ी नामों का उल्लेख है जिसमें सैकड़ों योद्धा बैठ सकते थे महाभारत में तो यंत्र 40 नामों का वर्णन मिलता है उस जमाने में से बराबर व्यापार होता रहता था।

वराहमिहिर में बृहद संहिता में तथा बुझने युक्ति कल्पतरू में नावों और जहाजों की की निर्माण कला का वर्णन किया है कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अध्यक्ष प्रकरण नौसेना और राज्य की ओर से नामों के प्रबंधन से संबंधित

राजा भोज ने शास्त्र के वैज्ञानिक माने जाते थे जिसके अनुसार चार प्रकार के वृक्षों ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शुद्र में से छतरी जाति के कास्ट से बनी नौका और जहाज उत्तम कोटि के होते हैं

युक्ति कल्पतरु में विभिन्न प्रकार की नौकाओं का वर्गीकरण दिया गया है यदि के काम में आने वाली नौका है सामान्य वर्ग में रखी जाती हैं जबकि समुद्र उपयोग में आने वाली विशेष वर्ग में रखी जाती है

विशेष नौकाओं को दो वर्गों में बांटा जाता था दीर्घा और उन्नति दीर्घा में दीर्घ िकार तरणी लो लागत वारा गामिनी तरी जमगाला प्लाविनी धारणी और योगिनी समृद्ध बताई गई जबकि उन्नता में उर्द वाहन उधवा गर्मी भी और मंथारा

नामों पर स्थिर कमरों की स्थिति के आधार पर उन्हें सर्व मध्य और अगर मंदिरा नाम दिए गए थे

विमान प्रौद्योगिकी :

विभिन्न प्रकार के विमानों का वर्णन केवल भारतीय शास्त्रों में मिलता है जो निर्विवाद रूप से सिद्ध करता है कि प्राचीन भारत में अभिमान प्रौद्योगिकी काफी उन्नत किस्म की रही थी

रामायण में इच्छाधारी पुष्पक विमान का वर्णन है जिसमें अनेक प्रकार की विशेषताएं थी

 विभिन्न प्रकार के विमानों के निर्माण उनके संचालन उनके रखरखाव सुरक्षा आदि के संबंध में जानकारी मानसी भारद्वाज लिखित ग्रंथ यंत्र सर्वस्व में दी गई बताई गई है इस ग्रंथ में विमान से संबंधित लगभग 50 संदर्भ ग्रंथों की चर्चाएं राजा भोज ने 11वीं शताब्दी में यंत्र सर्वस्व ग्रंथ का संपादन किया था

यंत्र सर्वस्व के 40 वें अधिकरण में विमान संबंधित विवरण दिया गया यज्ञ में विभाजित है

यंत्र सर्वस्व में महामुनी भारद्वाज ने कहा है कि विमान चलाने का अधिकारी वही व्यक्ति बन सकता है कि विमान संचालन से संबंधित 32 राज्यों में पारंगत हो यह 32 रहस्य विमानन के विभिन्न पक्षों से संबंधित हैं जिनमें विमान विमान निर्माण रखरखाव और संचालन के समय की विभिन्न गतिविधियां सम्मिलित हैं

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