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All posts by Dr. Shreesh K.

आवारगी

आवारगी; पर लिखने का मन है, आज, माफ़ करियेगा.मुझे ‘आवारा’ शब्द से इतनी ज्यादा नफ़रत रही है, कि मेरे पापाजी को जब मुझसे अधिकतम विरोध जताना होता है, तो वे इसी शब्द का प्रयोग करते हैं. और वे जानते हैं, कि मै तिलमिला पडूंगा..! पर

विरोधाभास की सत्ता

विश्व में जैसे विरोधाभास की सत्ता है। अद्भुत रूप से यह व्याप्त है। लगभग हर क्षण में जो अनिश्चितता का आश्चर्य है, उसके मूल में यही ‘विरोधाभास’ बसता है। नितांत प्रकश में आँखें अक्षम हो जाती हैं, अंधकार की तनिक उपस्थिति प्रकाश को देखने-समझने लायक

मंजिले और भी हैं और रुकना नहीं है कभी …!

यकीनन अपने लक्ष्य व उम्मीदों को लेकर सकारात्मक रहना चाहिए । लेकिन नकारात्मक चिंतन का भी प्रयोग किया जाना चाहिए । वस्तुतः जीवन में दोनों चिन्तनों का समुचित प्रयोग होना चाहिए । एक संतुलित सीमा के बाद सकारात्मकता, एक आश्वस्ति को जन्म देती है, जिससे

संवाद के पुल और भाषा की चुनौतियाँ

  भाषा का आविष्कार किसी चमत्कार से कम नहीं । वैसे तो जगत के सभी जीव परस्पर संवाद के लिए एक भाषा का प्रयोग करते हैं, चाहे हम उसे समझें अथवा नहीं, लेकिन मानव ने अपनी भाषा को दर्ज करने की कला भी ईजाद की

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चरित्रहीन पिंकीज: बाइपोलर डिसऑर्डर का समाज

  अपने देश में स्त्री का चरित्र प्रमाणन क्षण क्षण जारी होता है l कब कहाँ कैसे वह सहसा चरित्रहीन हो जाय, कह नहीं सकते l न्याय के भी कई स्तर हैं l परिवार का न्याय, धर्म का न्याय, समाज का न्याय, पंचो का न्याय

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सहजता-व-समय

जीवन स्मृतियों में है l जीवन ठीक वही से शुरू होता है, जहाँ से स्मृतियाँ अस्तित्व में आती हैं l विस्मृति ही मृत्यु है l स्मृतियों से बने मायने ही वर्तमान और भविष्य को भी निरखते हैं l स्मृतियाँ, बीते पलों को भी तरोताजा रखती