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नाना पाटेकर: ये कौन सी आंदोलन के जमाने वाली बातें कर रहे हो?

शाहिद कपूर: आंदोलन का कोई जमाना नहीं होता सर! वो तो कभी भी कहीं भी शुरू हो सकता है right sir?

Right! Right! बिल्कुल Right! आंदोलन का कोई जमाना नहीं होता है. जबजब समाज में कुछ गलत हो रहे के विरुद्ध प्रबुद्ध वर्ग में चेतना जागृत होती है, तबतब एक आंदोलन का प्रादुर्भाव होता है. अधिकांश लोग प्रबुद्ध वर्ग से तात्पर्य उच्च शिक्षित वर्ग से लगाते हैं, पर वास्तव में प्रबुद्ध का तात्पर्य उन लोगों से है जिनकी बुद्धि जगी हुई हो. यूँ तो सोकर उठने के बाद सबकी आँखें खुल जाती हैं, नाक, कान, हाथ, पैर काम करने लगते हैं पर सच में तो सिर्फ कुछ की ही आँखें जिन्दगी में खुल पाती हैं, बाकी तो जिन्दगी भर नींद में ही जीते हैं. एक ऐसी नींद में, जिसमे उन्हें अपने आस पास हो रहे कुछ भी गलत या सही का होश नहीं रहता. वे एक ऐसी सपनों की दुनिया में जीते हैं जिसमे सब सही है और जो गलत है, वह उनके सपनों का हिस्सा नहीं. वैसे भी सपने में इंसान खुद से जुडी चीजें ही देखता है, अपने काम से काम, भाड़ में जाये दुनिया तमाम

जागे हुए तो वो होते हैं जिनकी भौतिक ही नहीं बल्कि मानसिक इन्द्रियां भी चेतन अवस्था में रहती हैं, जो किसी बात को सिर्फ है तो हैकी नजर से नहीं बल्कि सही है तो क्यों और गलत है तो क्यों?की नजर से देखते हैं और सिर्फ देखते ही नहीं अपितु गलत को नकारकर सही के लिए आवाज़ उठाते हैं. वे दुनिया की लीक बदलने की काबिलियत रखते हैं और अपनी इसी क्षमता का जब वे प्रदर्शन करते हैं तो आती है परिवर्तन की बयार, रूढ़ियों के पत्ते झड जाते हैं, जागृति के फूल खिलते हैं, नयी सोच की कोपलें फूटती हैं और बस बदल जाता है नज़ारा, इस बदलाव की बयार से, इस आंदोलनसे. आंदोलन का मतलब ये नहीं की आप हाथ में बन्दूक, तलवार, लाठी, मशाल लेकर निकल पड़ें सडकों पर, अपने विरोधियों से भीड़ जाएँ और जो रास्ते में आये उसका सर फोड़ दें; आंदोलन का अर्थ है एक नयी सोच की लहर जो पहले से अधिक स्वच्छ, निर्मल और ओजस्वी हो. शांत लहरें जब उग्र रूप धारण करती हैं तो सब कुछ बदल डालने की कूबत रखती हैं, उनकी प्रचंडता में हर बुराई बह जाती है. भले ही सुनामी विनाशकारी प्रतीत हो, पर जितने प्रलयंकारी उसके कारण हैं, उनकी दशा में तो पूरी दुनिया के नष्ट हो जाने का खतरा है. कम से कम ये सुनामी एक नए सिरे से निर्माण कार्य की प्रणेता तो है.

अमेरिकी क्रांति के बाद जब अमेरिका की स्वतंत्रता का घोषणा पत्र लिखा गया तो उसमे एक पंक्ति लिखी गयी थी जिसका अर्थ है कि, “ अगर कुछ गलत हो रहा है तो जो उसे बदलने की ताकत रखते हैं, उन्हें कोशिश जरूर करनी चाहिए.अब ये हमपर निर्भर करता है की हम अपने अंदर की इस ताकत को पहचान पाते हैं या नहीं, और उसके बाद हम सोये रहकर जो जैसा है वैसा ही रहने देकर परिस्थियों से समझौता करना कहते हैं या जागकर अपने और दूसरों के हित में प्रयास करना चाहते हैं. मैं कहती हूँ कि कोई माँ के पेट से शक्तिमान बनकर तो पैदा नहीं होता और न ही किसी के सर के पीछे चक्र घूम रहा होता है, बस जरूरत होती है अपनी सोच को सामान्य से विशिष्ट बनाने की, सदैव भीड़ का हिस्सा बने रहने की आदत तो इंसान को उस कागज की नाव की तरह बना देती है, नाली के गंदे पानी और नदी के स्वच्छ जल में फर्क करने की समझ नहीं होती है, जो चाहे उसे अपने साथ बहा ले जाये.

हर समाज में अच्छाई और बुराई दोनों ही विद्यमान होती है. जरूरी नहीं की आंदोलन के नाम पर हर बात का विरोध किया जाना जरूरी है या फिर सब कुछ बदल डालना ही एक माध्यम है. आंदोलन में परिवर्तन की मात्रा आपके विवेक पर निर्भर करती है, समाज के बुरे तत्वों को हटकर, अच्छे तत्वों का सम्मिश्रण ही आंदोलन की सफलता है. जैसे कि एक रंग में दूसरा रंग मिला देने पर एक नया रंग बन जाता है. अब ये मिलाने वाले पर निर्भर करता है वो कितने अधिक विचारशील, रचनात्मक और सार्थक मिश्रण से कितना अच्छा संयोजन बना सकता है और अपनी कलात्मकता का परिचय देते हुए उस सुगठित, सुसंयोजित और सुंदर रंग को जन्म दे सकता है जो पहले दोनों रंगों से बेहतर हो. जैसे एक जगह रुका हुआ पानी सड़ जाता है पर वहीँ नदी का बहता जल सदा निर्मल बना रहता है, वैसे ही अब ये हमारे ऊपर है की हम जड़ बने रहकर अपना अस्तित्व खो देना कहते हैं या फिर एक कदम बढ़ाना चाहते हैं हवा की विपरीत दिशा में, उसका रुख मोड़ने को, जिससे आ सके समाज में एक परिवर्तन की बयार और खड़ा हो सके एक सजग आंदोलन.

मैं अकेला ही चला था जानिब मंजिल

लोग आते गए और कारवां बनता गया…..

शिवांगी पटेल

M. Phil. समाजशास्त्र

दिल्ली विश्वविद्यालय

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One thought on “आंदोलन”

  1. Shreesh K. Pathak says:

    ek behatreen aalekh.

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