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साहित्य पठन की स्थिती पर जनसत्ता का एक बेहतरीन लेख

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यह ऐसा दौर है, जब व्यक्तिवादी प्रवृत्तियों ने जीवन की सामुदायकिता को दरकिनार कर दिया है। मध्यवर्ग में पढ़ने की प्रवृत्ति बहुत कम दिखाई देती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकास के साथ अधिसंख्य लोग पढ़ने के बजाय देखने की इच्छा रखते हैं। यही वजह है कि सूचना माध्यमों पर चित्रात्मक और मनोरंजन कर सकने वाली सूचनाओं का प्रसारण प्रमुख होता गया है। मोबाइल युग में सूचनाएं इसी रूप में अधिक आने लगी हैं। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य पढ़ने वाले विद्यार्थी प्राय: वही पढ़ते हैं, जो उनके पाठ्यक्रम में होता है। पाठ्येतर साहित्य पढ़ने की इच्छा बहुत कम में रह गई है। बहुत कम ऐसे विद्यार्थी निकलते हैं, जो पाठ्यक्रम के अलावा साहित्य पढ़ते हैं, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं पढ़ते हैं। ऐसे विद्यार्थी जिनको किसी प्रतियोगिता वगैरह की परीक्षाओं में बैठना होता है, वे ज्यादातर सूचनात्मक सामग्री, वह भी अंगरेजी माध्यम से पढ़ते हैं। उनके पाठ्यक्रम में जो किताबें हैं, अगर उन्हें उनसे इतर कुछ अच्छी किताबें मिलती हैं, तो कभी-कभार ही पढ़ते हैं। –

पूरा लेख यहाँ पढ़े : http://www.jansatta.com/politics/who-will-take-care-of-the-literature/68234/#sthash.UCWixcCV.dpuf

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