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सहजता-व-समय

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जीवन स्मृतियों में है l जीवन ठीक वही से शुरू होता है, जहाँ से स्मृतियाँ अस्तित्व में आती हैं l विस्मृति ही मृत्यु है l स्मृतियों से बने मायने ही वर्तमान और भविष्य को भी निरखते हैं l स्मृतियाँ, बीते पलों को भी तरोताजा रखती हैं l सभी पल याद नहीं रहते l पर जिन पलों में कुछ खासियत होती है, वे जरुर मन में बसे होते हैं l मानव विचारशील है l विचार में होना कहते किसे हैं- उन्हीं स्मृतियों को अलग अलग ढंग से देखने को l उनके अनुभवों को अलग अलग तलों पर ले जाता है, अलग अलग स्तिथियों में कल्पित करता है, और हर बार एक निष्कर्ष की ओर मुड़ता है l इन निष्कर्षों से ही उसके परिप्रेक्ष्य निर्मित होते हैं l मनुष्य अपनी स्मृतियों के अनगिन प्रयोग करता है, इसप्रकार विचारशील कहलाता है l
वह कौन सी प्रेरणा है, जो मानव को अपनी स्मृतियों से अन्यान्य प्रयोग करने को बाध्य करती है? सबसे शक्तिशाली प्रेरणा संभवतः मानव की एक अक्षमता यह है कि मानव अपनी स्मृतियों से खेल सकता है पर कब तक खेल सकता है…यह उसे नहीं पता होता l सहसा स्मृतियाँ आती हैं और सहसा ही लोप हो जाती हैं l समय के आविष्कार की आवश्यकता हो गयी क्योंकि स्मृति शाश्वत नहीं है l इसके आविष्कार की आवश्यकता हुई अर्थात यह प्राकृतिक नहीं है, कृत्रिम है l समय के आविष्कार ने जीवन वैसा नहीं रहने दिया, जैसा ये असल में है l प्रकृति में इतना कुछ है पर कहीं भी कोई प्राकृतिक घड़ी नहीं है l अब जीवन सहज नहीं रहा l अब जीवन में दौड़ते रहने की जरुरत महसूस हुई l एक परिधि पर दौड़ने का कुछ अर्थ भी है, परन्तु जिस परिधि का ज्ञान न हो उस पर दौड़ना….?
जीवन की सहजता को समय की गणनाओं ने बाँध दिया l समय का आविष्कार एक निरंतर चेतावनी का अविष्कार है जो हमेशा सूचित करती रहती है कि हमें अपने मनोवांछित भविष्य के हिसाब से वर्तमान को रंगते रहना चाहिए l यह एक और अप्राकृतिक विकास है क्योंकि जीवन अनिश्चितताओं की गोद में पलता है l एक अनिश्चित भविष्य के लिए अपने प्रत्यक्ष वर्तमान की सहजता से मुंह मोड़ लेना समझदारी तो नहीं है l समय का अविष्कार क्रेडिट कार्ड की संकल्पना पर चलता है, जो भविष्य की आमदनी का एक हिस्सा आज ही खरचने को उकसाता है l भविष्य यदि वही हुआ जो सोचा हुआ था तब तो ठीक नहीं तो वर्तमान में ही हम डिफॉल्टर हो जाते हैं l हम सहसा वक्त के गुलाम हो जाते हैं, हम अपने लिए जीना छोड़ देते हैं l यह एक गहरी परतंत्रता है l डिफॉल्टर का वर्तमान एक बिका हुआ वर्तमान है, जिससे किसी नेतृत्व या सहभाग की उम्मीद करना बेमानी है l
यही से निराशा उपजती है और फिर जीवन से उमंग नदारद हो जाते हैं l उमंग एक स्वतंत्र व्यक्ति के विश्वास व आस से उपजती है, जो सहजता के सारे आयामों को जीने की शक्ति देती है l सहजता ही अभीष्ट है l सहजता में ही जीवन के स्वाद उजागर होते हैं l आधुनिक जीवन में सहजता और समय परस्पर वैरी हैं l समय का अनुशासन जरुरी है, पर उतना ही जितना कि हम समझें कि हमारे लिए अनुशासन है, हम अनुशासन के लिए नहीं हैं l सहजता श्रेष्ठ मूल्य है l सहजता का तात्पर्य सम रहना है l सहजता हमें सुख और दुःख दोनों का सामना करना सीखाती है l सुख में अतिरेक न हो, दुःख में व्यतिरेक न हो, इसलिए सहजता श्रेयस्कर है l सहजता में ही व्यक्ति की नैसर्गिक आभा अपनी छटा बिखेरती है l

(चिरंतन के लिए: डॉ. श्रीश )

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