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’श्री रामचरितमानस’ में मित्र धर्म

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‘श्री रामचरितमानस’ में मित्र धर्म
जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी |
तिन्हहि बिलोकत पातक भारी ||
निज दुःख गिरी सम रज करी जाना |
मित्रक दु:ख रज मेरु समाना || १ ||
जो लोग मित्र के दुःख से दु:खी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है |
अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख
को सुमेरु पर्वत (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने || १ ||

जिन्ह कें असि मति सहज न आई |
ते सठ कत हठि करत मिताई ||
कुपथ निवारी सुपंथ चलावा |
गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा || २ ||
जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मुर्ख हठ करके क्यों किसी
से मित्रता करते हैं ? मित्र का धर्म है कि वह मित्र को बुरे मार्ग से रोककर अच्छे
मार्ग पर चलाये | उसके गुण प्रगट करे और अवगुणों को छिपाये || २ ||

देत लेत मन संक न धरई |
बल अनुमान सदा हित करई ||
बिपति काल कर सतगुण नेहा |
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा || ३ ||
देने लेने में मन में शंका न रखे | अपने बल के अनुसार सदा हित ही करता रहे |
विपत्ति के समय में तो सदा सौ गुना स्नेह करे | वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्र के
गुण (लक्षण) ये हैं || ३ ||

आगें कह मृदु बचन बनाई |
पाछें अनहित मन कुटलाई ||
जा कर चित अहि गति सम भाई |
अस कुमित्र परिहरेहि भलाई || ४ ||
जो सामने तो बना-बनाकर कोमल वचन कहता है और पीठ पीछे बुराई
करता है तथा मन में कुटिलता रखता है – हे भाई! (इस तरह) जिसका मन साँप
की चाल के समान टेढा है, ऐसे कुमित्र को त्यागने में ही भलाई है || ४ ||
(श्री रामचरित, किष्किन्धा काण्ड: ६,१,२,३,४)

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