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शेषनाग की हुंकार से आजतक उबलता है यहाँ का पानी

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मनिकरण सयुक्त रूप से हिन्दुओ और सिक्खों का एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं । मनिकरण हिमाचल प्रदेश राज्य में हिमालय की गोद में पार्वती घाटी में पार्वती नदी और व्यास नदी के बीच पार्वती नदी के किनारे बसा हुआ हैं, इसकी समुंद्र तल से ऊँचाई लगभग 1760 मीटर हैं । कुल्लू से यह 45किमी०, मनाली से 88किमी० और भुंतर से 35 किमी० दूर हैं । मनिकरण मुख्यतः अपने खौलते हुए गर्म पानी के चश्मे (कुंड) और खूबसूरत प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध हैं । माना जाता हैं कि यह गर्म पानी गंधक युक्त हैं और इस पानी से स्नान करने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं । 


मनिकरण में भगवान रामजी, शिवजी, नैनाभगवती आदि के मंदिर और एक गुरुद्वारा हैं । यहाँ हमें प्रकृति का एक अदभुत चमत्कार देखने को मिलता हैं कि एक तरफ नदी में बहता बर्फ जैसा ठंडा पानी दूसरी और उसके किनारे खौलता हुआ गर्म पानी का कुंड, जो इतने गर्म हैं की कुछ मिनिटो में खाना पक जाये । 

मणिकर्ण का महात्य और मान्यता

मनिकरण मुख्यता दो शब्दों से मिलकर बना हैं पहला “मणि” यानि बहुमूल्य पत्थर और दूसरा “कर्ण” यानि कान । हिंदू धर्म के अवधारणा के अनुसार मनिकरण को ब्रह्मांड पुराण में सबसे उत्तम कुलान्त पीठ में स्थित श्रेष्ठ तीर्थराज माना जाता हैं । ब्रह्मांड पुराण में इस तीर्थ का नाम वेद ने हरी हरी कहा हैं और दूसरा नाम अर्धनारीश्वर और तीसरा नाम चिंतामणि हैं । 


कहा जाता है कि शेषनाग ने भगवान शिव के क्रोध से बचने के लिए यहां एक दुर्लभ मणि फेंकी थी। इस वजह से यह चमत्कार हुआ और यह आज भी जारी है

मणिकर्ण में शेषनाग ने भगवान शिव के क्रोध से बचने के लिये यह मणि क्यों फेंकी, इसके पीछे की कहानी भी अनोखी है। मान्यताओं के अनुसार मणिकर्ण ऐसा सुंदर स्‍थान है, जहां भगवान शिव और माता पार्वती ने करीब 11 हजार वर्षों तक तपस्या की थी।

मां पार्वती जब जल-क्रीड़ा कर रही थीं, तब उनके कानों में लगे आभूषणों की एक दुर्लभ मणि पानी में गिर गई थी। भगवान शिव ने अपने गणों को इस मणि को ढूंढने को कहा लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी मणि नहीं मिली। इससे भगवान शिव बेहद नाराज हो गए। यह देख देवता भी कांप उठे। शिव का क्रोध ऐसा बढ़ा कि उन्‍होंने अपना तीसरा नेत्र खोल लिया, जिससे एक शक्ति पैदा हुई। इसका नाम नैनादेवी पड़ा।

नैना देवी ने बताया कि दुर्लभ मणि पाताल लोक में शेषनाग के पास है। सभी देवता शेषनाग के पास गए और मणि मांगने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर शेषनाग ने दूसरी मणियों के साथ इस विशेष मणि को भी वापस कर दिया। हांलाकि वह इस घटनाक्रम से काफी नाराज भी हुए। शेषनाग ने जोर की फुंकार भरी, जिससे इस जगह पर गर्म जल की धारा फूट पड़ी।

मणि वापस पाने के बाद पार्वती और शंकर जी प्रसन्‍न हो गए। तब से इस जगह का नाम मणिकर्ण पड़ गया।

मणिकरण स्थित गुरुनानक देव गुरुद्वारा

हिमाचल के मणिकरण का यह गुरुद्वारा बहुत ही प्रख्यात स्थल है। ज्ञानी ज्ञान सिंह लिखित “त्वरीक गुरु खालसा” में यह वर्णन है कि मणिकरण के कल्याण के लिए गुरु नानक देव अपने 5 चेलों संग यहाँ आये थे।

गुरु नानक ने अपने एक चेले “भाई मर्दाना” को लंगर बनाने के लिए कुछ दाल और आटा मांग कर लाने के लिए कहा। फिर गुरु नानक ने भाई मर्दाने को जहाँ वो बैठे थे वहां से कोई भी पत्थर उठाने के लिए कहा। जब उन्होंने पत्थर उठाया तो वही से गर्म पानी का स्रोत बहना शुरू हो गया। यह स्रोत अब भी कायम है और इसके गर्म पानी का इस्तमाल लंगर बनाने में होता है। कई श्रद्धालू इस पानी को पीते और इसमें डुबकी लगाते हैं। कहते है के यहाँ डुबकी लगाने से मोक्ष प्राप्त होता है।

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