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राष्ट्रवादी बाइक और यादों का रिफाइंड

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भारत की सीमाओं पर खड़ा एक सैनिक ना जाने क्या-क्या बलिदान कर देता है हमारी देश की रक्षा के लिए । महीनों घर नहीं आता, जान दांव पर लगा देता है, शारीरिक कष्ट, अकेलापन और कई बार सरकार की बेरुखी। मगर इन सब के बाद अगर कोई चीज सबसे अधिक उसे हौसला देती है तो यह कि देश की आम जन की भावनाएं उसके साथ जुड़ जाती है । देश का बच्चा बच्चा उसे सम्मान की नजरों से देखता है।

कुछ ऐसी ही नागरिक चेतना के उद्देश्य के लिए हुई थी ‘फ्रांसीसी क्रांति’ जिसे राष्ट्रवाद का उदय माना जाता है।
हमारे बाजार ने क्या किया ? उस थके हारे सैनीक की पोशाक का इस्तेमाल किया बाइक बेचने के लिए। किसी ने शहद बेचा, किसी ने चवनप्राश, किसी ने आटा बेचा तो किसी ने साबुन; यह सब हुआ और हो रहा है उस सैनिक की वर्दी की तस्वीर दिखाकर।
उदाहरण के लिए, हीरो मोटरसाइकिल का एक विज्ञापन आता है, एक सैनिक बस में चढ़ता है, बस में मौजूद सभी उसे सेल्यूट करने लगते हैं। टैगलाइन चलती है ‘हीरो सेल्यूट करता है रियल हीरो को जो हमारी रक्षा में जी-जान से लगे रहते हैं’।

 

दूसरा विज्ञापन। भारत में टैक्स देने से बचने के लिए कनाडा की नागरिकता लिए हुए भारत के ‘राष्ट्रवादी अभिनेता’ अक्षय कुमार सैनिकों को घर की याद दिलाते हैं, और सफोला में बना हुआ खाना खिलाते हैं। मतलब जनता की भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए उन्हीं की आंखों में धूल झोंक दो और कुछ भी बेच दो।

 


हमारा राष्ट्रवाद और उस सैनिक की निष्ठा और उसकी वर्दी एक शोपीस बनकर रह गई है। जरा पूछियेगा एक ‘असली’ सैनिक से की क्या अहमियत है उसकी वर्दी की उसके लिए। मगर नहीं इन्हें तो बस अपना माल बेचना है। जरा संभल कर, कहीं भावनाओं के आगोश में गलत सामान ना खरीदें हम-आप; क्योंकि राजीव भाटिया यह काम मुफ्त में नहीं करते।

बात सिर्फ एक कलाकार की या एक-दो विज्ञापनों की नहीं हो रही है। यह भी बात सही है की भावनाओं को अपील करके बाजार सजाना कोई नई बात नहीं है, ऐसा होता रहा है और होता रहेगा। परंतु इस नए चलन में इस बात की चर्चा करने की ज़हमत भी नहीं उठाई जाती कि उस वस्तु की वास्तविक गुणवत्ता क्या है । हीरो के विज्ञापन में कंपनी अपने आप को बस ऐसे परोस देती है जैसे हीरो की मोटरसाइकिल मात्र सैनिकों को सैल्यूट करने के लिए बनाई गई हो । अरे घनचक्करों, कम से कम इतना तो बता दो बाइक माइलेज कितना देती है। क्या कोई बता सकता है कि फला ब्रांड का आटा खाने पर ही मैं देशभक्त कैसे हूं और मोहल्ले की आटा चक्की के आटे से क्यों नहीं?
फ़र्ज़ करिये कभी आप किसी नौकरी के लिए आवेदन करते हैं और इंटरव्यू आप अपनी उपयुक्तता ना बता कर कहने लगते हैं कि मैं इस देश के सैनिकों को सैल्यूट करता हूं। क्या आप सच में देशभक्ति दिखा रहे हैं? बल्कि देशभक्ति की भावना का इस्तेमाल कर रहे हैं।

हकीकत यह है कि यह कंपनियां सैनिकों की वर्दी की इमेज दिखा कर अपना बाजार सजा रही है, अपना माल बेच रहीं हैं । होना तो यह चाहिए था यह कंपनियां अपनी अरबों के मुनाफे का कुछ प्रतिशत सैनिकों की भलाई में लगाती है परंतु पता नहीं ऐसा वास्तविकता में कितना करेंगी।

देशभक्ति एक ऐसी नागरिक चेतना है जो हमारे देश की रक्षा और हमारी परिस्थितियों में सुधार के लिए परम आवश्यक है। और एक सैनिक की वर्दी इस देशभक्ति की भावना का सबसे आदरणीय प्रतीक, इसे उपभोग की वस्तु नहीं बनाया जाना चाहिए।

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