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राजनीति और मीडिया में आक्रामकता की संस्कृति

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चित्र साभार गूगल

राजनीति और मीडिया में आक्रामकता की संस्कृति-अब यह एक बेहद आम बात हो चुकी है; उनके लिए, जिनके समझ की सुबह नई तरह की राजनीति और मीडिया के जमाने में हुई है|
यह उनके लिए एक ‘बुरी आदत’ की तरह नहीं है बल्कि एक नए तरह के व्यवहार की बात है|
लेकिन जिस पीढी ने बातचीत के सबसे खुले माध्यम- मिल-बैठकर बात करने की संस्कृति को देखा और जिया है; उनके लिए यह सब किसी बडी समस्या से कम नहीं है|चाहे सोशल मीडिया हो या राजनीति, आज की दशा यह है कि यह किसी व्यक्ति या स्थिति के बारे में हमें पहले रूढिवादी विचार देता है लेकिन तीसरे, दसवें या बीसवें विचार के लिए यहां न तो समय है, न ही जगह|
न्यूज चैनलों के प्राइम टाइम शोज़ में, जहां राजनीति और मीडिया के धुरंधर अपना बेहतरीन समय देते हैं (उनके अनुसार); वहां बातों से हमला करने, चिल्लाकर दूसरों की आवाज को दबाने और विषयान्तरों के साथ पूरी बातचीत को दो या तीन मुद्दों पर ही केन्द्रित करने का जो प्रक्रम चला है; वह आज की राजनीति और मीडिया की एक वीभिषक देन है| वहां जो जितना आक्रामक है, वह उतना ही बेहतर वक्ता माना जाता है|
यह बातचीत की एक नए तरह की संस्कृति है. इससे बुरा हाल तो सोशल मीडिया का है जहां धैर्य और खोज की जबरदस्त कमी है| जहाँ बिना किसी ठोस आधार के, बिना समय जाया किए विचारों का त्वरित खंडन प्रारंभ होता है और यह क्रम कब बढते-बढते घृणित संवादों का रूप ले लेता है, पता ही नहीं चलता।
इसमें कोई दो राय नहीं कि बातचीत के इस नए तरीके ने हमारे संवाद के हर लगभग हर माहौल को प्रभावित किया है। इससे सामाजिक और मानसिक क्षति तो होती ही है पर यह देखना दिलचस्प होगा कि यह हमें शारीरिक रूप से भी नुकसान पहुंचा सकता है।
यू.एस.ए. के नार्थइस्टर्न विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की प्रोफेसर लीला फेल्डमैन बैरेट लिखती हैं कि वैज्ञानिक रूप से शब्दों का हमारे तंत्रिका तंत्र पर गहरा प्रभाव पडता है। बिना शारीरिक संपर्क के भी कुछ आवाजें हमें बीमार कर सकती हैं, हमारा दिमाग खराब कर सकती हैं; हमारे तंत्रिका तंत्र की कोशिकाओं को खत्म कर सकती हैं और हमारे जीवन की अवधि को घटा सकती हैं।
दरअसल हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में प्रोइफ्लैमेटरी साइटोकिन्स नामक कुछ प्रोटीन होते हैं, जो हमारे घायल होने पर सूजन पैदा करते हैं। लेकिन कुछ परिस्थितियों में ये साइटोकिन्स स्वयं शारीरिक बीमारी का कारण बन सकते हैं। वे परिस्थितियां क्या हैं?
उन परिस्थितियों में से एक है पुराना तनाव।
हमारे शरीर में आनुवांशिक पदार्थों की एक छोटी सी थैली भी होती है जो गुणसूत्रों के सिरों पर रहती है। उन्हें टेलोमेसेस कहा जाता है। जब भी हमारी कोशिका विभाजित होती है, उसके टेलोमेरेस कुछ छोटे हो जाते हैं। और जब वे बिल्कुल छोटे हो जाते हैं तो आदमी की मृत्यु हो जाती है। यह है तो सामान्य रूप से उम्र बढने की प्रक्रिया। जैसा कि पहले भी जिक्र किया गटा है, एक परिस्थिति ऐसी भी है जो हमारे टेलोमेरेस को संकुचित करता है,
वह है- पुराना तनाव।

चित्र साभार गूगल

यदि शब्द तनाव पैदा कर सकते हैं और लंबे समय तक तनाव से शारीरिक नुकसान होता है, तो ऐसा लगता है कि शब्द भी हिंसा का एक रूप हैं।
ये उसी प्रकार के शब्द हैं जिनका प्रयोग मीडिया और राजनीतिक आरोप- प्रत्यारोप में होता है। मीडिया में वक्ताओं और लेखकों के खिलाफ सख्त और इस तरह के हिंसक विरोघ जताने की प्रवृत्ति तेजी से बढी है। पहले आरोप- प्रत्यारोप के कर्कश द्वंद्व के बीच भी आपसी समझ बनाने की जो गुंजाइश मौजूद रहती थी; वह अब मुख्यधारा से गायब सी हो गई लगती है।
लोगों के साथ बहस करने की जहमत उठाने के बजाए इस आक्रामक संस्कृति के पुरोधा उन्हें खामोश करना ज्यादा जरूरी समझते हैं। यह आक्रामक चेतावनी इसी सिद्धांत पर आधारित है कि कुछ विषयों पर चर्चा से पुराने जख्म उभर सकते हैं।
निरंतर घृणास्पद शब्दों के प्रयोग की प्रवृत्ति और आक्रामकता की संस्कृति मन और शरीर के लिए जहरीला है और हम सब इसके पीडित हैं।
असल समस्या विरोधी विचारों को महत्व न दे पाने की है। सामाजिक सोच की प्रकृति आज इस रूप में विकसित हो रही है कि हम जिस विचार से सहमत न हों, उसका अस्तित्व में रहना हमारे विचार के अस्तित्व के लिए खतरनाक है।
शब्दों का तनाव हमेशा बुरा नहीं होता; लेकिन इसका लाभ तभी होता है जब हम दूसरों के विचारों को केवल अपने नजरिए से न देखें। विरोधी विचारों को किसी अन्य नजरिए से देखने का अभ्यास करना एक अच्छा तनाव है और यह कुछ सीखने में हमारी मदद करता है; न कि हमें नुकसान पहुंचाता है।

चित्र साभार गूगल

आक्रामकता की संस्कृति हमारे और समाज के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है जबकि विरोधी विचार लोकतंत्र के लिए जीवनदायी होता है। इससे पहले कि इस तरह की आक्रामकता को ही बातचीत का स्थायी तत्व बना दिया जाय, हमें ‘अच्छे तनाव’ के साथ जीना सीखना होगा।

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