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यह असहिष्णुता का प्रश्न तो हरगिज नहीं है

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भंसाली साहब पर हुए हमले की निंदा की जानी चाहिए, परंतु यह असहिष्णुता का प्रश्न तो हरगिज नहीं है.
सत्य की वस्तुनिष्ठता (objectivity) भी कोई चीज है. असहिष्णुता का प्रश्न तब उठता है जब सत्य को परिभाषित ना किया जा सके, सब्जेक्टिव हो .
उदाहरण के लिए कोई कह सकता है कि गांव की महिलाएं शहरों की महिलाओं से ज्यादा व्यवहार कुशल होती है. कोई इस बात से सहमत हो सकता है, हो सकता है कोई बात से सहमत ना हो. दोनों को एक दूसरे के विचारों का सम्मान करना चाहिए,
अगर वह ऐसा नहीं करते हैं, एक दूसरे की बात से सहमत नहीं होते हैं और एक दूसरे को गलत ठहराने पर तुले रहते हैं तो इसे असहिष्णुता कहा जाएगा.
परंतु अगर सत्य वस्तुनिष्ट हो, ऑब्जेक्टिव हो, एक तत्व के रूप में पेश किया जा सकता हो तो वहां पर असहिष्णुता का प्रश्न नहीं उठता. उदाहरण के लिए अगर किसी कक्षा में कोई अध्यापक 5 को 4 से भाग देने पर उत्तर दो बताता है और कोई बालक कक्षा में खड़ा होकर यह कहता है कि मास्टर जी आप गलत पढ़ा रहे हैं तो क्या वह असहिष्णु कहा जाएगा, उस बालक को उद्दंड कह सकते हैं, हम उस बालक को अधीर कह सकते हैं, हम उसे सजा दे सकते हैं कि तुम कक्षा में खड़े होकर के क्यों बोले. परंतु हम उसके ऊपर असहिष्णु होने का इल्जाम नहीं लगा सकते हैं .   भंसाली साहब के साथ जो भी हुआ वह गलत है उन उद्दंड व्यक्तियों के ऊपर कड़ी कानूनी कारवाई की जानी चाहिए परंतु रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर ेतथ्यों से छेड़छाड़ की छूट भी नहीं दी जानी चाहिए चाहे आप किसी भी विचारधारा के समर्थक हों, अगर कोई तथ्य ऐतिहासिक रूप से स्थापित है तो उसे चुनौती देने के लिए पर्याप्त शोध होना चाइये.

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