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भारत का महान बाड़ा

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आप सभी ने चीन की दीवार के बारे में सुना होगा, पर क्या आपने कभी  भारत के विशाल बाड़े के बारे में सुना है ? जी हां , सुनने में यकीन तो नहीं आता पर यह सत्य है ।भारत में 19वीं सदी में एक महान बाड़े का निर्माण हुआ था जो लगभग 10 फीट ऊंचा था और 1200 स्क्वायर मील का क्षेत्रफल लिए था। यह पंजाब के लाहय्यां से नर्मदा के तट पर बुरहानपुर तक जाता था। पर इस विशालकाय बाड़े का निर्माण आखिर हुआ क्यों था?
 अब विलुप्त हो चुका यह बाड़ा अंग्रेजी भारत के आंतरिक सीमा शुल्क रेखा का एक हिस्सा थी जो उड़ीसा से लेकर खयबेर तक जाती थी। यह आंतरिक सीमा शुल्क रेखा आखिर क्या थी?


आश्चर्यजनक रूप से लोग इस महान बाड़े की सभी यादें भुला चुके हैंl इस आंतरिक सीमा शुल्क रेखा का पता तब चला जब एक पुस्तक संग्रहकर्ता Roy मैक्सहोम को लंदन की एक पुस्तक की दुकान से एक भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत अंग्रेज की लिखी पुस्तक मिली, जिसमें उसने इस आंतरिक सीमा शुल्क रेखा का उल्लेख किया था l प्रारंभ में Roy मैक्स को यह एक कपोल कल्पना लगी l लेकिन फिर उसने भारत का दौरा किया इस कहानी के टूटे हुए कड़ियों को जोड़ने के लिए और  फिर अपनी खोज के आधार पर उसने एक पुस्तक लिखी, The Great Hedge of India: The Search for the Living Barrier that Divided a People p… जो कि सन 2001 में प्रकाशित हुई।


मैक्सहोम के अनुसार इस आंतरिक सीमा शुल्क रेखा की उत्पत्ति भोजन में पाए जाने वाले एक मूल पदार्थ नमक से जुड़ी हुई है । 1750 के दशक में अपनी बंगाल पर विजय के बाद अंग्रेजों ने अपनी आय बढ़ाने के लिए नमक पर कर लगाने का विचार किया । 1772 में वारन हेस्टिंग ने बंगाल में सभी नमक उत्पादक क्षेत्रों को कंपनी के अधीन कर लिया जिससे नमक उत्पादन पर बंगाल में कंपनी का एकाधिकार हो गया । कंपनी इन नमक के उत्पादन क्षेत्रों को पट्टे पर देती थी और वहां से निश्चित दाम पर नमक खरीदी थी । निश्चय ही कंपनी इसे फिर ऊंचे दाम पर खुले बाजार में बेच दी थी इस पूरी प्रक्रिया से कंपनी ने शीघ्र ही अपना मुनाफा तिगुना कर लिया।


परंतु इसके साथ ही खुले बाजार में नमक की कीमतें बढ़ने लगी जिससे एक आम हिंदुस्तानी को अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा नमक खरीदने में खर्च करना पड़ा । इस कारण उड़ीसा में उत्पादित नमक स्मगल होकर बंगाल के क्षेत्र में आने लगा । इसको रोकने के लिए कंपनी ने एक आंतरिक सीमा रेखा निर्धारित की तथा उस पर चौकियां लगा दी।



जैसे-जैसे कंपनी के अधीन बड़ा क्षेत्र आने लगा उसके क्षेत्रीय प्रशासकों ने अपनी सुविधा अनुसार सीमा रेखा का निर्धारण कर दिया इसे विभिन्न शहरों में और विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग सीमा रेखा बनती चली गई


1857 विद्रोह के बाद जप विधि ब्रिटिश सरकार ने भारत का नियंत्रण अपने अधीन ले लिया तो इस सीमा रेखा के निर्धारण की पूरी प्रक्रिया को नियमित करने के लिए एक विराट सीमा रेखा बनाने की योजना बनाई जो कि इस्लामाबाद से लेकर बुरहानपुर तक और फिर उड़ीसा के सोनपुर तक जाती थी।


इस सीमा रेखा के आर-पार स्मगलिंग को रोकने के लिए यह जरूरी था कि इस पर कोई निर्माण कराया जाए परंतु दीवार बनाने की बात विशाल संभावना से बाहर थी क्योंकि यह बहुत खर्चीला विचार था अतः यह फैसला किया गया कि इस सीमा रेखा पर एक बार का निर्माण किया जाएगा इस बार के निर्माण की जिम्मेदारी और विचार आया ए ओ ह्यूम द्वारा जो उस वक्त भारत के जो उस वक्त भारत के आंतरिक सीमा शुल्क अधिकारी थे।


AO hume ने इस बाड़ के निर्माण पर 1867 से काम करना शुरु कर दिया । उन्होंने इसके लिए विभिन्न मौसमों में मिट्टी और पौधों का परीक्षण किया आखिरकार वह एक जीवविज्ञानी थे इसके बाद 1869 ने इस बड़े का तेजी से विस्तार का फैसला लिया गया तथा पंजाब के लाहय्यां से बुरहानपुर तक इसका निर्माण प्रारंभ करा दिया गया।


सिलवानी का निर्माण में बबूल बांस और अन्य कटीले पौधों का इस्तेमाल हुआ था इसकी समानता ऊंचाई 10 फीट तथा चौड़ाई 9 फीट थी यह बाड़ा नमक की स्मगलिंग के साथ-साथ अफीम तथा अन्य प्रतिबंधित पदार्थों की स्मगलिंग को भी रोकता था।


परंतु यह बाड़ा कितना कारगर सोचा गया था उतना अधिक कारगर साबित नहीं हुआ निश्चय ही इसमें से मानसिक सीमा शुल्क से होने वाली आय को बढ़ोतरी की परंतु साथ ही इसके अधिकारियों में भ्रष्टाचार में भी काफी बढ़ोतरी हो गई।


धीरे-धीरे ब्रिटिश सरकार ने इस बाड़े के निर्माण और विस्तार की योजना को तिलांजलि दे दी साथ ही आगे आने वाले समय में होनेवाले कर सुधारों के कारण पूरे देश में एक समान कर लागू हो गए जिससे स्मगलिंग अप्रासंगिक हो गई अतः अब इस बाड़े की आवश्यकता नहीं रही।

परंतु अप्रासंगिक होने के बावजूद भी इस बाड़े नें अपने पद चिन्ह जरुर छोड़े या पाया गया की आजादी के बाद कई दुर्गम क्षेत्रों में यह बड़ा ही एकमात्र ऐसी सीधी रेखा बची थी जिसका इस्तेमाल कर सड़क निर्माण किया जा सकता था।


1998 में मैक्सओम को इस बारे का एकमात्र हिस्सा जो मिला वह इटावा में मौजूद था शायद इस वक्त वह भी वक्त के थपेड़ों से ढह गया होगा

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