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बाल विवाह निषेध कानून

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गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में दी गयी एक व्यवस्था के बाद नाबालिग से विवाह का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। उच्च न्यायालय ने अपनी व्यवस्था में कहा है कि बाल विवाह निषेध कानून मुस्लिम समुदाय सहित समाज के सभी वर्गों पर लागू होता है और इसका उल्लंघन होने की स्थिति में नाबालिग से विवाह के लिये जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ इस कानून के तहत मामला बनता है।
उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला ने कहा है कि बाल विवाह निषेध कानून एक विशेष कानून है और यह मुस्लिम पर्सनल ला, हिन्दू विवाह कानून या किसी भी अन्य पर्सनल कानून के प्रावधानों के ऊपर है। उच्च न्यायालय ने इसके साथ ही इस मामले में आरोपी यूनुस शेख के खिलाफ बाल विवाह कानून के प्रावधानों के तहत पुलिस को जांच करने का आदेश दिया।
इस मामले में यूनुस ने अपने पड़ोस में रहने वाली 16 साल की लड़की से शादी की थी। उसका तर्क था कि बाल विवाह निषेध कानून उस पर लागू नहीं होता क्योंकि वह मुस्लिम पर्सनल ला के दायरे में आता है पर न्यायालय ने उसकी इस दलील को ठुकरा दिया और कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में संशोधन की इजाजत नहीं देने वालों ने पूरे समुदाय का बहुत अहित किया है। भारतीय दंड संहिता के तहत 15 साल से कम उम्र की महिला से यदि उसका पति जबरन संबंध स्थापित करता है तो यह दंडनीय अपराध है। इसे बलात्कार संबंधी कानूनी प्रावधान के अपवाद के दायरे में रखा गया है।
इसी तरह शरीयत व्यवस्था के तहत 15 साल की उम्र में रजस्वला होने वाली लड़की को अपनी मर्जी से विवाह का अधिकार है। शायद यही कारण है कि भारतीय दंड संहिता में 15 साल से अधिक उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा गया। इस मामले में भी 18 साल से कम उम्र में यौन संबंध स्थापित करने के कानूनी प्रावधान की अनदेखी ही होती है।
बाल विवाह निषेध कानून के तहत 21 साल की आयु से कम उम्र के लड़के और 18 साल से कम उम्र की लड़की का विवाह कानूनी दृष्टि से मान्य नहीं है। इस उम्र से कम आयु में शादी करने का दोषी पाये जाने पर दो साल तक की कैद और एक लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। इसी तरह, विशेष विवाह कानून के तहत भी लड़का और लड़की का बालिग होना जरूरी है।
हिन्दू विवाह कानून के तहत 18 साल से कम आयु में होने वाली शादी वैसे तो अमान्य नहीं है लेकिन ऐसी शादी में यदि किसी पक्ष की आयु 18 साल से कम थी तो वह बालिग होने के बाद ऐसे विवाह को अमान्य करार देने के लिये अदालत में आवेदन कर सकता है। इस तरह का आवेदन नहीं करने की स्थिति में इस दंपति के बालिग होने पर विवाह मान्य हो जाता है।
इन तमाम कानूनी प्रावधानों के बीच लड़कियों के विवाह की उम्र ही केन्द्र बिन्दु है। सवाल यह है कि क्या 18 साल की उम्र में लड़कियां शारीरिक और मानसिक रूप से इतनी परिपक्व हो जाती हैं कि वे दांपत्य जीवन की जिम्मेदारी उठा सकें।
लड़की की विवाह की न्यूनतम आयु को लेकर व्याप्त विसंगति का मुख्य कारण भारतीय दंड संहिता, किशोर न्याय कानून, हिन्दू विवाह कानून और शरीयत कानून में नाबालिग की आयु के बारे में अलग-अलग प्रावधान भी हैं। ऐसी स्थिति में लड़कियों के लिये विवाह की या फिर यौन संबंध स्थापित करने की न्यूनतम आयु के बारे में एकरूपता कायम करने की आवश्यकता है।
यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 45 फीसदी से अधिक लड़कियों का विवाह 18 साल की उम्र में हो जाता है जबकि करीब 18 फीसदी लड़कियों की 15 साल की उम्र में ही शादी हो जाती है। यह भी देखा गया है कि कम उम्र में वैवाहिक जीवन में बंधने के कुछ साल बाद ही अनेक पति-पत्नी अलग-अलग रहने लगते हैं और इस वजह से कुटुम्ब अदालतों में जहां वैवाहिक विवादों से संबंधित मुकदमों की संख्या बढ रही है वहीं अदालतों में घरेलू हिंसा और ससुराल में प्रताड़ना के मामलों में भी वृद्धि हो रही है।
इसी तथ्य के मद्देनजर मद्रास उच्च न्यायालय ने एक प्रकरण में सवाल उठाया था कि यदि लड़का 21 साल में विवाह के योग्य या परिपक्व होता है तो फिर लड़की के मामले में यह कैसे माना जा सकता है कि 18 साल की उम्र में वह इस तरह की जिम्मेदारी वहन करने की स्थिति में होती है।
ऐसी स्थिति में यह सवाल उठता है कि देश में जब लड़की के विवाह की उम्र 18 वर्ष और लड़कों की 21 वर्ष हो तो क्या इससे कम आयु में होने वाले विवाह को मान्यता देना उचित है? एक सवाल यह भी है कि क्या नाबालिग लड़की से विवाह करने वाले युवक को सारे तथ्यों के आधार पर सिर्फ अपहरण या नाबालिग को जबरन बंधक बनाने के अपराध में ही दोषी ठहराना पर्याप्त है?
ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिन पर राजनीतिक दलों और विभिन्न समुदाय के प्रबुद्ध लोगों को गंभीरता से विचार करके लड़की की विवाह की उम्र के बारे में आम सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए।

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