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बंजारी देवी

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बंजारी माता की मूर्ति बगुलामुखी रूप में होने से तांत्रिक पूजा के लिए विशेष मान्यता है। मंदिर में स्वर्ग-नरक के सुख और यातना को विविध मूर्तियों व पेंटिंग के माध्यम से दर्शाया गया है।देशभर में घूमने वाले बंजारा जाति के लोगों की देवी चूंकि बंजारी माता को माना जाता है, इसलिए इस मंदिर में बंजारे पूजा-अर्चना करते थे। कालांतर में मंदिर का नाम ही बंजारी मंदिर पड़ गया।रावांभाठा स्थित मां बंजारी मंदिर प्रदेशभर में प्रसिद्ध है। करीब 500 साल पहले मुगलकालीन शासकों के जमाने में छोटा-सा मंदिर था, जो 40 साल पहले विशाल मंदिर के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ। बंजर धरती से प्रकट होने के कारण प्रतिमा बंजारी देवी के नाम से मशहूर हुई।चैत्र व क्वांर नवरात्रि में हजारों की संख्या में जोत प्रज्ज्वलित किए जाते हैं। मंदिर की ओर से 10 महाजोत भी प्रज्ज्वलित की जाती है। मंदिर के पीछे गौशाला और गुरुकुल का संचालन भी किया जाता है मूर्ति का मुख उत्तरपश्चिम दिशा में होने से इसे वास्तु के अनुसार उत्तम माना जाता है।

स्कन्दमाता: पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। इनकी उपासना नवरात्रि में पांचवें दिन की जाती है। स्कन्दमातृस्वरूपिणी देवी की चार भुजाएं हैं। ये दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा से भगवान स्कन्द को गोद में पकड़े हुए हैं और दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है।

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साभार morchhattigarh

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