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तीन तलाक बनाम सच्चर रिपोर्ट और नागालैंड एंगल

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तलाक किसी भी दंपत्ति के लिए अच्छी घटना नहीं होती और भारतीय समाज में तो बिल्कुल भी नहीं फिर चाहे वह किसी भी धर्म का हो या जाति का हो| परंतु फिर भी तलाक हमारे समय की एक सच्चाई और इसकी नीव को समाज में बढ़ती स्वच्छंदता से इतर समानता और बढ़ती जवाबदेही से जोड़ कर देखना चाहिए|
हाल के कुछ वक्त में मुस्लिम समाज की तीन तलाक की रवायत बहस के केंद्र में आ गई है| कारण है इसमें सुधार की मांग |  मगर मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग इन सुधारों को लेकर आशंकित है| पड़ताल करते हैं कि सच में यहकितनी जायज है?

आखिर यह तीन तलाक का मुद्दा क्या है?

शायरा बानो को उनके शौहर ने एक पत्र के जरिए सूचित किया कि उसने उन्हें तलाक दे दिया है. यह पत्र 10 अक्टूबर, 2015 को लिखा गया था. उन्हें उनके पति ने फोन पर बताया कि कुछ जरूरी कागज भेज रहा हूं. मगर जब शायरा ने इन कागजात को खोलकर देखा तो यह तलाकनामा था. इस दो पन्ने के पत्र में कई बातों के अलावा यह साफ-साफ लिखा था, ‘शरीयत की रोशनी में यह कहते हुए कि मैं तुम्हें तलाक देता हूं, तुम्हें तलाक देता हूं, तुम्हें तलाक देता हूं, इस तरह तिहरा तलाक देते हुए मैं मुकिर आपको अपनी जैजियत से खारिज करता हूं. आज से आप और मेरे दरमियान बीवी और शौहर का रिश्ता खत्म. आज के बाद आप मेरे लिए हराम और मैं आपके लिए नामहरम हो चुका हूं.’

भारत में लगभग 18 करोड़ मुसलमान रहते हैं. उनकी शादी और तलाक के मामले मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक तय होते हैं, जो जाहिर तौर पर शरिया कानून पर आधारित होते हैं.
कुछ आधुनिक शिक्षा से प्रभावित व्यक्तियों का दावा है कि पवित्र कुरान में तलाक को न करने लायक काम का दर्जा दिया गया है। यही वजह है कि इसको खूब कठिन बनाया गया है। तलाक देने की एक विस्तृत प्रक्रिया दर्शाई गई है। परिवार में बातचीत, पति-पत्नी के बीच संवाद और सुलह पर जोर दिया गया है। पवित्र कुरान में कहा गया है कि जहां तक संभव हो, तलाक न दिया जाए और यदि तलाक देना जरूरी और अनिवार्य हो जाए तो कम से कम यह प्रक्रिया न्यायिक हो। इसके चलते पवित्र कुरान में एकतरफा या सुलह का प्रयास किए बिना दिए गए तलाक का जिक्र कहीं भी नहीं मिलता। इसी तरह पवित्र कुरान में तलाक प्रक्रिया की समय अवधि भी स्पष्ट रूप से बताई गई है। एक ही क्षण में तलाक का सवाल ही नहीं उठता। खत लिखकर या टेलीफोन पर एकतरफा और जुबानी तलाक की इजाजत इस्लाम कतई नहीं देता। एक बैठक में या एक ही वक्त में तलाक दे देना गैर-इस्लामी है।
शरीयत कानून में हलाला एक तरह से तीन तलाक देने के बाद शौहर के लिए हराम हो चुकी उसी बीवी को दोबारा हासिल करने का तरीका है. यानी तीन तलाक देने के बाद अगर फिर शौहर का मन करे कि वह अपनी बीवी को वापस अपने साथ रखे तो पहले उस औरत का निकाह किसी दूसरे मर्द से करवाया जाता है. एक रात गुजारने के बाद औरत का दूसरा शौहर उसे तलाक दे देता है और फिर वह औरत अपने पहले शौहर के साथ निकाह कर लेती है. इस पूरी प्रक्रिया को हलाला कहते हैं.

इन सबसे निराश शायरा बानो ने फरवरी में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. इसमें उन्होंने तीन बार तलाक बोलकर तलाक देने की प्रक्रिया पर पूरी तरह से रोक लगाने की मांग की. उनका कहना है, ‘जब निकाह के वक्त शौहर और बीवी दोनों की रजामंदी की जरूरत होती है तो फिर तलाक के वक्त क्यों नहीं? मौजूदा हलाला की व्यवस्था औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ है, बहुविवाह के जरिए यह बताया जाता है कि मर्द के लिए औरत कितनी मामूली-सी चीज है.’ सुप्रीम कोर्ट में 23 फरवरी, 2016 को दायर याचिका में शायरा ने गुहार लगाई है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के तहत दिए जाने वाले तलाक-ए-बिद्दत यानी तिहरे तलाक, हलाला और बहुविवाह को गैर-कानूनी और असंवैधानिक घोषित किया जाए. गौरतलब है कि शरीयत कानून में तिहरे तलाक को मान्यता दी गई है. इसमें एक ही बार में शौहर अपनी पत्नी को तलाक-तलाक-तलाक कहकर तलाक दे देता है.

तीन तलाक मुद्दे की आधारशिला को समझने के बाद आईए जानते हैं सच्चर समिति के बारे में-

सच्चर समिति क्या है?

देश में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक दशा जानने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में दिल्ली हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। 403 पेज की रिपोर्ट को 30 नवंबर, 2006 को लोकसभा में पेश किया गया। पहली बार मालूम हुआ कि भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति-जनजाति से भी खराब है।

समिति ने भारतीय मुसलमानों को समान अवसर मुहैया कराने के लिए कई तरह के सुझाव दिए थे और साथ ही उचित मेकैनिज्म अपनाने का भी सुझाव दिया था।

सच्चर समिति ने भारतीय मुसलमानों के पिछड़ेपन के बारे में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की. भारतीय मुसलमानों के उत्थान के लिए इसने कई सिफारिशें की हैं। इसने शिक्षण संस्थानों में गैर-मुस्लिम ओबीसी नामांकन को लगभग उनकी आबादी के बराबर/करीब बताया. इसने जरूरतमंदों की पहचान करने के लिए वैकल्पिक प्रणाली की भी सिफारिश की

सच्चर समिति के सुझाव

सच्चर समिति जिसने भारतीय मुसलमानों के पिछड़ेपन का अध्ययन किया है, ने असली पिछड़े और जरूरतमंद लोगों की पहचान के लिए निम्नलिखित योजना की सिफारिश की है।
योग्यता के आधार पर ,
घरेलू आय पर आधारित (जाति पर ध्यान दिए बिना) ,
जिला (ग्रामीण/शहरी और क्षेत्र) जहां व्यक्ति ने अध्ययन किया, पर आधारित,
पारिवारिक व्यवसाय और जाति के आधार पर|

भारतीय मानव संसाधन मंत्री ने भारतीय मुसलमानों पर सच्चर समिति की सिफारिशों के अध्ययन के लिए तुरंत एक समिति नियुक्त कर दी, लेकिन किसी भी अन्य सुझाव पर टिप्पणी नहीं की।

सच्चर कमेटी ने मुसलमानों को हर क्षेत्र में ज्यादा तरजीह देने की सिफारिश की थी ताकि उनके रहन-सहन और सामाजिक-आर्थिक हालत में सुधार हो सके। इसके बाद तत्कालीन पीएम ने 15 प्वाइंट प्रोग्राम की शुरूआत भी की जिसमें मुसलमानों को शिक्षा और नौकरी के लिए बेहतर अवसर मुहैया कराए जाने की रणनीति का खाका खींचा गया।

अतः तीन तलाक के मुद्दे और सच्चा सच्चर समिति की सिफारिशों को समझने के बाद यह बड़ी आसानी से देखा जा सकता है कि दोनों में मुख्यता निम्न अंतर हैं-

  1.  सच्चर समिति की सिफारिशों का आधार मुख्यता आर्थिक सामाजिक है जबकि तीन तलाक संबंधी सुधार मुख्यता धार्मिक सामाजिक प्रवृत्ति के हैं |
  2.  सच्चर समिति की रिपोर्ट मुसलमानों का अन्य जातियों और धर्मों की तुलना में अध्ययन करती है जबकि तीन तलाक का मुद्दा मुस्लिम धर्म के अंदर सुधारों से निहित है|

मुसलमान शंका में क्यों है?

मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग को यह लगता है कि सुप्रीम कोर्ट और सरकार शरिया कानून और तीन तलाक की रवायत में दखल देकर असल में मुसलमानों के धार्मिक मामलों में नाजायज दखल दे रहे हैं, जो कि उनकी धार्मिक आजादी पर एक आघात है|

परंतु फिर भी हमने यह जानना चाहा कि भारतीय मीडिया ने आम मुस्लिम जनमानस को कितना कवर किया है और कितना स्थान दिया है| इसके लिए हमने एक बड़ा आसान सा तरीका चुना, Google सर्च| और हमने पाया आम मुसलमान की आवाज नदारद है|

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अगर कुछ नेताओं की भाषा पर नजर डाली जाए तो वह ऐसी है-

सपा के कद्दावर नेता आज़म खान ने पूरे देश में छिड़ी तीन तलाक की बहस के बीच एक बड़ा बयान दिया है। आज़म खान ने कहा है कि अगर शरीयत लॉ के खिलाफ भी कोई आदेश आता है, तो मुस्लिम लोग शरीयत कानून को ही मानेंगे।

सच्चर समिति की रिपोर्ट को लेकर सरकार के साथ खड़ा रहने वाला मुसलमान आखिर सुधारों के नाम पर पीछे क्यों हटने लगता है?

इसी संदर्भ में एक और घटना पर नजर डालते हैं जो पिछले कुछ दिनों में अखबारों में छाई रही|

नागालैंड एंगल-

हाल में नागालैंड में एक हिंसक घटनाक्रम के बाद महिलाओं को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित कर दिया गया।

यह हक उन्हे दशकों के संघर्ष और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद प्राप्त हुआ था। आश्चर्य की बात है कि महिला अधिकारों के हनन की इतनी बड़ी घटना को लेकर न समाज में कोई प्रतिक्रिया दिखी और न ही राजनीतिक दलों ने इसका संज्ञान लिया।

जो महिलाएं, किसी कॉलेज में छात्राओं के जींस पहनने पर रोक के निर्णय का विरोध करने सड़कों पर उतर जाती थी, वह भी नागालैंड में महिला अधिकारों की हत्या का तमाशा चुपचाप देखती रही। जो स्वयंसेवी संगठन और समाजसेवी तमिलनाडु के पारंपरिक खेल जल्लीकट्टू का गला फाड़ कर विरोध करते है, उनकी नागालैंड के मामले में आवाज तक नहीं निकली। मीडिया और मानवाधिकार संगठनों में भी इसे लेकर सन्नाटा पसरा रहा। आखिर कौन जिम्मेदार है मानवाधिकारों की हत्या और उसपर इस चुप्पी का?

नगालैंड में स्थानीय निकायों के चुनाव में भड़की हिंसा संविधान में आदिवासी इलाकों को दी गई स्वायतत्ता और समाज सुधार के सरकारी प्रयास के बीच द्वंद्व है। इसलिए इस मुद्‌दे को महज राजनीतिक कहकर नहीं टाल सकते।

  • Nagaland में महिलाएं लंबे समय से स्थानीय निकायों में आरक्षण की मांग कर रही हैं। अब जब दिसंबर 2016 में सरकार ने महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया तो आदिवासी समाज का पारम्परिक संगठन भड़क उठा।
  • उसका कहना है कि अनुच्छेद 234 (टी) के तहत दिया गया यह आरक्षण पूर्वोत्तर के आदिवासी क्षेत्र नगालैंड को संविधान के अनुच्छेद 371 (ए) के तहत दिए गए विशेषाधिकार का उल्लंघन है।
  • पूर्वोत्तर के ये इलाके संविधान की पांचवी अनुसूची में आते हैं जहां पर राज्यपाल की मंजूरी के बिना केंद्र और राज्य सरकार का कोई कानून लागू नहीं किया जा सकता। इसके अलावा 371 (ए) आदिवासियों को अपनी परम्परा और रीति-रिवाज की हिफाजत का भी अधिकार देता है।
एक राजनीतिक और सामाजिक विरोधाभास
  • अब उनके कौन से अधिकार पारम्परिक हैं और कौन से रीति-रिवाज पुराने हैं, इसका फैसला वहां रह रही 18 आदिवासी जातियों के संगठन मिल-जुलकर करते हैं।
  • सरकार का मत है की स्थानीय निकायों का गठन आधुनिक है, इसलिए उन्हें आदिवासियों की परम्परा और प्रथा के दायरे में नहीं ला सकते।
  • लेकिन नगालैंड के पारम्परिक आदिवासी संगठन को यह आरक्षण स्वीकार नहीं है और इसके विरोध में उन्होंने कोहिमा में नगर पालिका का दफ्तर फूंका और मुख्यमंत्री आवास पर भी हमला किया।

कभी रीति-रिवाज, कभी जाति ,कभी धर्म और कभी मर्यादा के नाम पर महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करना और उन्हें बराबरी से वंचित करना उनके नासिर संवैधानिक अधिकारों का की अवहेलना है बल्कि उनके नैसर्गिक अधिकारों का दोहन|

यहां मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के बारे में आवश्यक जानकारी ले लेना अच्छा रहेगा-

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड क्या है?

भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लिकेशन एक्ट साल 1937 में पास हुआ था। इसके पीछे मकसद भारतीय मुस्लिमों के लिए एक इस्लामिक कानून कोड तैयार करना था। उस वक्त भारत पर शासन कर रहे ब्रिटिशों की कोशिश थी कि वे भारतीयों पर उनके सांस्कृतिक नियमों के मुताबिक ही शासन करें। तब(1937) से मुस्लिमों के शादी, तलाक, विरासत और पारिवारिक विवादों के फैसले इस एक्ट के तहत ही होते हैं। एक्ट के मुताबिक व्यक्तिगत विवादों में सरकार दखल नहीं कर सकती।
कैसे बनी शरीयत?
अरब में इस्लाम के बतौर धर्म आने से पहले, वहां एक कबीलाई सामाजिक संरचना थी। कबिलों में जो नियम और कानून थे वे लिखे हुए नहीं थे। ये कानून समय के साथ और जब समाज ने बदलाव की जरूरत महसूस की तो बदलते गए। सातवीं सदी में मदीना में मुस्लिम समुदाय की स्थापना हुई और फिर जल्द ही आस-पास के इलाकों में यह फैलने लगा। इस्लाम की स्थापना के साथ ही कबीलाई रीति रिवाजों पर कुरान हावी हो गई। कुरान में लिखे और अलिखित रीति रिवाज शरीयत के तौर पर जाने जाते हैं। इस्लामिक समाज शरीयत के मुताबिक चलता है। इसके साथ ही शरीयत हदीस ( पैगंबर के काम और शब्द) पर भी आधारित है। मूल रूप से, वे समाज में व्यावहारिक समस्याओं के लिए बहुत व्यापक और सामान्य समाधान थे।
समय के साथ कैसे विकसित हुई शरीयत ?
यह बहस करना एक बड़ी गलती होगी कि कई सदियों से शरीयत में कोई बदलाव नहीं हुआ है। पैगंबर के जिंदा रहते हुए कुरान में लिखे कानून पैगंबर और उनके समाज के सामने आ रही समस्याओं के समाधान के लिए थे। उनकी मौत के बाद कई धार्मिक संस्थानों और अपने न्यायिक व्यवस्था में शरीयत लागू करने वाले देशों ने समाज की जरूरतों के मुताबिक इन कानूनों की व्याख्या की और इन्हें विकसित किया। इस्लामिक लॉ की चार संस्थाएं हैं, जो कि कुरान की आयतों और इस्लामिक समाज के नियमों की अलग-अलग तरह से व्याख्या करते हैं। चार संस्थाएं (हनफिय्या, मलिकिय्या, शफिय्या और हनबलिय्या) चार अलग-अलग सदियों में विकसित हुई। मुस्लिम देशों ने अपने मुताबिक इन संस्थाओं के कानूनों को अपनाया।
क्या भारत में पर्सलन लॉ मुसलमानों के लिए ही है ?
भारत में अन्य धार्मिक समूहों के लिए भी ऐसे कानून बनाए गए हैं। देश में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग सिविल कोड है। उदाहरण के तौर पर 1956 का हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, इसके तहत हिंदू, बुद्ध, जैन और सिखों में विरासत में मिली संपत्ति का बंटवारा होता है। इसके अलावा 1936 का पारसी विवाह-तलाक एक्ट और 1955 का हिंदू विवाह अधिनियम इसके उदाहरण हैं।

क्या तलाक को सरल रखकर कुछ हासिल होगा?

शादी जन्म−जन्मांतरों का बंधन होता है। लेकिन खंडित और शून्य वैवाहिक जीवन टूट ही जाए तो अच्छा है। ऐसे वैवाहिक जीवन को घसीटते रहने से क्या फायदा, जिसमें वे न स्वयं को विवाहित कह पाते हैं और न ही अविवाहित होते हैं। वे अन्यत्र विवाह कर पाने के लिए भी स्वतंत्र नहीं होते इसलिए यह अत्यंत पीड़ादायक स्थिति होती है, चाहे उसके लिए कोई भी जिम्मेदार हो।

ऐसी स्थिति में यह उचित है कि बेकार हो चुके विवाहों को जारी रखने की विवशताएं किसी भी तरह समाप्त की जाएं। इसके लिए आवश्यक है कि पति−पत्नी स्वयं दांपत्य संबंधों की समीक्षा करते हुए अपने अंतर्मन को टटोलें। जब ऐसा लगे कि साथ रह पाना सर्वथा असंभव है तब विवाह संबंध परस्पर सहमति से समाप्त करने का निर्णय ले लें। ऐसा करते समय न निरर्थक जल्दबाजी करें और न ही अहं व हठी दृष्टिकोण अपनाएं।

यह भी आवश्यक है कि कानून द्वारा तलाक के लिए और भी सहज एवं सरल प्रक्रिया अपनाई जाए। परिवार एवं समाज में विवाह एवं दांपत्य की परम्परागत रूढि़वादी व दकियानूसी सोच जैसे कि बाल विवाह, दहेज विवाह आदि पर रोक लगाई जाए तो परिवार टूटने से बच सकेंगे।

मुस्लिम महिलाओं का पक्ष कहां है?

सच पूछिए तो मुस्लिम महिलाओं का पक्ष गायब है| मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड अपनी मीटिंग में कहा है कि लगभग 3:30 करोड़ महिलाओं ने शरिया के नियम से ही चलने में सहमति दिखाई है परंतु यह बात खुद मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड कह रहा है जिसके खिलाफ पूरा विवाद खड़ा हुआ है|

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