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“तीन तलाक” पर “तड़ाक”

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तीन “तलाक़” वैसे कोई बड़ी समस्या नहीं है.. वैसे तो लोग किसी को बिना कुछ बोले भी रिश्ते तोड़कर चले जाते हैं.. मगर.. कभी आपने सोचा है कि जो औरत बरसों आपके साथ रही, आपके बच्चे पाले,  आपका घर संभाला उसे इन सब के बावजूद सिर्फ ये हक़ मिला है कि आप बोलें “तलाक़ तलाक़ तलाक़”  और वो अपना रास्ता नाप ले?
ये समस्या नहीं बल्कि औरत की इज़्ज़त का सवाल है और आपकी ये आदिम पद्धति औरत को सिर्फ “Use And Throw” साबित कर रही है.. औरतें डिस्पोजेबल गिलास नहीं हैं.. ये पंरपरा अपमान है औरत का इस इक्कीसवीं सदी में
बेहतर है आप बदलना सीखें वक़्त के साथ.. क़ौम की असल ज़रूरत का ख़याल कीजिये और अब आदिम मुद्दों को अपना अहंकार न बनाइये.. ये आपकी औरतें ही हैं जो आपके मज़हब को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाती आ रही हैं बिना अपना भला बुरा सोचे
औरतें जाग रही हैं और ज़रूरत है कि आप अब औरतों के हक़ों की इज़्ज़त करना सीख जाएँ..  ये हवाई जहाज़ उड़ाने से लेकर ओलंपिक जीतने वाली औरतें हैं.. ये अब आपके रहमों करम की ग़ुलाम नहीं हैं.. कहीं ऐसा न हो कि आने वाले वक़्त में जब आप बोलें “तलाक़ तलाक़ तलाक़” तो आपको अपने ही गाल मुबारक पर जवाब मिले “तड़ाक तड़ाक तड़ाक”.. ये नौबत न आने दीजिये.. वक़्त रहते चेत जाईये ।
सौजन्य : ताबिश सिद्दीकी

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