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जिग्मेत से सीखें देशभक्ति

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एक सज्जन एक हफ़्ते की छुट्टियों के लिए परिवार समेत लद्दाख गए। उनका स्थानीय ड्राइवर 28 साल का एक युवक था जिसका नाम जिग्मेत था। जिग्मेत के परिवार में उसके माता पिता, पत्नी और उनकी दो छोटी बेटियां थी।
जिग्मेत और उन सज्जन की  उस हफ़्ते भर की हिमालय यात्रा के दौरान हुयी वार्तालाप कुछ यूँ है।
प्रशांत -: इस हफ़्ते के अंत में  लद्दाख में छुट्टियों का मौसम ख़त्म हो जाएगा। सैलानी अब अगले साल आएंगे। क्या तुम भी गोवा जाओगे? जैसे और नेपाली , रोज़ी रोटी की खोज में होटल में काम तलाश करने जाते हैं ?
जिग्मेत -: नहीं . मैं लद्दाखी ही हूँ। मैं जाड़ों में कहीं और नहीं जाऊँगा।
प्रशांत -: तो फिर जाड़ों में यहाँ काम क्या करोगे?
जिग्मेत -: ( शरारत से हँसते हुए) कुछ नहीं । चुप चाप घर में बैठूँगा।
प्रशांत -:मतलब 6 महीने ? अप्रैल तक ?
जिग्मेत -: मेरे पास एक काम पाने का एक विकल्प है। सियाचेन जाना I
प्रशांत-: सियाचन  ? वहाँ क्या करोगे भला ?
जिग्मेत -: भारतीय सेना में लोडर का काम !
प्रशांत -: मतलब तुम भारतीय सेना में जवान की पोस्ट पर भर्ती होंगे ?
जिग्मेत-: नहीं । जवान बनने की उम्र सीमा मैं लाँघ चूका हूँ । ये तो भारतीय सेना का एक कॉन्ट्रैक्ट जॉब है। अपने कुछ और ड्राइवर दोस्तों के साथ मैं 265 की दूरी तय कर के सेना के सियाचेन बेस कैंप पर जाऊँगा । वहां मेरा शारीरिक परीक्षण होगा जिससे पता लगेगा कि मैं इस काम के लिए शारीरिक रूप से स्वस्थ हूँ की नहीं । अगर मैं फ़िट घोषित होता हूँ तो भारतीय सेना हमें वर्दी , गर्म कपड़े, जूते और हेलमेट इत्यादि देगी । 15 दिन तक पहाड़ों पे चलकर हम सियाचेन पहुँचेंगे। सियाचेन जाने के लिए हमारे पर और कोई साधन नहीं है। हमारे पास सियाचेन पहुँचने के लिए ऐसी कोई सड़क नहीं है जो गाड़ियों के योग्य हो। हम तीन महीने वहां काम करेंगे।
प्रशांत -: और सियाचेन में काम क्या करोगे ?
जिग्मेत-: बताया तो.. लोडर का काम है। एक चौकी से दूसरी चौकी पर पीठ पर सामन ढो के ले जाना है।  सियाचेन में सारा सामान हेलीकॉप्टर द्वारा ज़मीन पर गिरा दिया जाता है। हम उस सामान को बटोरते हैं और चौकी तक पहुँचाते हैं।
प्रशांत -: तो सेना ये काम खच्चरों से भी तो करवा सकती है।
जिग्मेत -: साहब, सियाचेन ग्लेशियर है। ट्रक या और कोई गाडी काम नहीं कर सकेगी वहां। खच्चर या घोड़े 18875 फ़ीट की ऊंचाई और सियाचेन के -50 डिग्री सेल्सियस के जाड़े में ज़िंदा नहीं रह सकते।
प्रशांत -: तो इतने कम ऑक्सीजन लेवल पर तुम लोड कैसे उठाते हो ?
जिग्मेत -: हम एक बार में ज़्यादा से ज़्यादा 15 किलो तक का सामान उठा सकते हैं।एक दिन में दो घंटे ही काम  करते हैं। उसके बाद का सारा समय सेना हमें स्वास्थ लाभ के लिए दिया जाता है।
प्रशांत-: ये तो जोखिम का काम है।
जिग्मेत -:मेरे बहोत से दोस्त काल के मुंह में समा चुके हैं । कुछ को तो गहरी खाईयों निगल गयीं। कुछ को दुश्मन की गोली का निवाला बन गए।    सबसे बड़ा ख़तरा फ्रॉस्ट बाईट है। पर इन सबके बावजूद ये काम ख़ुशी देता है। हर महीने 18000 रुपए मिलते हैं।क्योंकि हमारा सारा खर्च सेना ही उठाती है , हम इन तीन महीनों में  कम से कम 50000 रुपये बचा लेते हैं। इन रुपयों से मेरे परिवार की देख रेख,  मेरी बेटियों की पढाई लिखाई सबका इंतज़ाम हो जाता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात की मैं सेना के लिए काम कर रहा हूँ, यानी अपने देश के लिए काम कर रहा हूँ।
😥🙏🙏जिस ज़िन्दगी और जीवनशैली को हम अपना अधिकार मानते हैं, उसका मूल्य उपरोक्त बातचीत से आँका जा सकता है। इसे अपने बच्चों के साथ साझा अवश्य करें ताकि वो आसानी से प्राप्त हुए संसाधनों के पीछे की कड़ी मेहनत से अवगत हो सकें।

सौजन्य : नवनीत सिकेरा जी

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