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‘छेरछेरा’ छत्तीसगढ़िया त्योहार

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 छत्तीसगढ़ में छेरछेरा पर्व का विशेष महत्व है , यह इस बार जनवरी माह की 2 तारीख को मनाया गया  इस दिन बच्चे घरघर जाकर “छेरछेरा छेरछेरा कोठी का धान ला, हेर हेरा हेर हेरा” कहते हुए सबके सब से त्यौहारी ग्रहण करते हैं।

छत्तीसगढ़ में यह पर्व नई फसल के खलिहान से घर आने के बाद मनाया जाता है। पौष मास की पूर्णिमा को प्रतिवर्ष छेरछेरा का त्यौहार मनाया जाता है । छेरछेरा पर्व पर पहले लोगों की टोलियां घर घर पहुंच कर दान मांगा करती थी , किसान अपने घर के दरवाजे पर धान अथवा अन्य उपज का बोरा खोलकर सुबह से उठ जाता था, और छेरछेरा का आवाज लगाने वाली टोली के हर सदस्य को मुट्ठी भर कर दान दिया करता था । अब यह परंपरा लुप्त हो गई है।  बच्चों की टोलियां आज भी गांवों और गांव से लगे कस्बा, शहरी इलाकों में छेरछेरा की आवाज लगाई दिखाई पड़ती हैं।  किसान और उससे जुड़ा परिवार आज भी अनाज रुपए-पैसे का दान इस पर्व पर करता है ।

इस पर्व के 10 दिन पहले ही डंडा नृत्य करने वाले लोग आसपास के गांवों में नित्य करने जाते हैं । वहां उन्हें बड़ी मात्रा में धान और रुपये मिल जाते हैं । इस त्यौहार के दिन कामकाज पूरी तरह बंद रहता है । इस दिन लोग प्रायः गांव छोड़कर बाहर नहीं जाते ।

  विद्वानों के अनुसार छेरछेरा मूलतः संस्कृत के *श्रेयस्य श्रेयाः* शब्द का अपभ्रंश है।इसका अर्थ होता है ‘ कल्याण हो-कल्याण हो।’इस पर्व पर हर किसी को कम से कम पांच घरों में श्रेयस्य श्रेयाः या छेरछेरा का उदघोष करना चाहिए।

छेरछेरा अन्न दान का पर्व है,कहा जाता है  कि छेरछेरा पर अन्न दान करने से घर में अनाज की कोई कमी नहीं रहती। परंपरा अनुसार इसे छेरछेरा पुन्नी भी कहा जाता हैं। अनेक ग्रामों में इस दिन मड़ई मेला का आयोजन भी है। सभी दान में मिला धान बेचकर अपना जेब खर्च निकालते हैं।


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