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छत्तीसगढ़ का इतिहास

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प्रागैतिहासिक काल : सभ्यता के आरम्भिक काल में मानव की आवश्यक्ताएँ न्यूनत्तम थीं, जो उसे प्रकृति से प्राप्त हो जाती थीं। मनुष्य पशुओं को भाँति ज़गलो, पर्वतों और नदी के तटों पर अपना जीवन व्यतीत करता था। नदियों की घाटियाँ प्राकृतिक रूप से मानव का सर्वोत्तम आश्रय स्थल थीं।

पूर्व पाषाण युग : पूर्व पाषाण युग के औजार महानदी घाटी तथा रायगढ जिले के सिंघनपुर से प्राप्त हुए हैं।

मध्य पाषाण युग : मध्य युग के लम्बे फ़लक, अर्द्ध चंद्राकार लघु पाषाण के औजार रायगढ जिले के कबरा पहाड़ से, चित्रित शैलाश्रय के निकट से प्राप्त हुए हैं।
उत्तर पाषाण युग : उत्तर पाषाण युग के लघुकृत पाषाण औजार महानदी घाटी, बिलासपुर जिले के धनपुर तथा रायगढ जिले के सिंघनपुर के चित्रित शैलाश्रय के निकट से प्राप्त हुए हैं।
नव पाषाण युग : इस युग के औजार दुर्ग जिले के अर्जुनी, राजनांदगांव जिले के चित्तवा डोगरी तथा ,रायगढ जिले के टेरम नामक स्थानों से प्राप्त हुए हैं। इस काल में मानव सभ्यता की दृष्टि से विकास कर चुका था तथा उसने कृषि कर्म, पशुपालन, गृह निर्माण तथा बर्तनों का निर्माण, कपास अथवा ऊन कातना आदि कार्य सीख लिया था।
ताम्र और लौह युग :  दुर्ग जिले के करहीभदर, चिरचारी और सोरर में पाषाण घेरो के अवशेष मिले हैं। इसी जिले के करकाभाटा से पाषाण घेरे के साथ लोहे के औजार और मृद भाण्ड प्राप्त हुए हैं। धनोरा नामक ग्राम से लगभग 500 महापाषाण स्मारक प्राप्त हुए हैं।
ऋग्वैदिक काल : ऋग्वैदिक काल में आर्यो का विस्तार पंजाब तक हुआ था ,सम्भवतः इसी कारण वश छत्तीसगढ़ में ऋग्वैदिक काल की कोई जानकारी प्राप्त नही होती है l
उत्तर वैदिक काल : परवर्ती वैदिक साहित्य में नर्मदा का उल्लेख रेवा के रूप में मिलता हैं. महाकाव्यों में इस क्षेत्र का पर्याप्त उल्लेख मिलता है।
रामायण काल : ‘रामायण’ से ज्ञात होता है कि राम की माता कौशल्या राजा भानुमन्त की पुत्री थीं। कोसल राज्य दो भागों में बंटा हुआ था। दक्षिण कोसल जिसकी राजधानी श्रावस्ती थी और उत्तर कोसल जिसकी राजधानी साकेत थी।
दक्षिण कोसल राज्य में भानुमन्त नामक राजा हुआ, जिसकी पुत्री का विवाह अयोध्या के राजा दशरथ से हुआ था। ऐसा माना जाता है कि वनवास के समय  सम्भवत: राम ने अधिकांश समय छत्तीसगढ के आस-पास व्यतीत किया था।
स्थानीय परम्परा के अनुसार शिवरीनारायण, खरौद आदि स्थानो को रामकथा से सम्बद्ध माना जाता है। लोक विश्वास के अनुसार श्री राम , द्वारा सीता का त्याग कर देने पर तुरतुरिया में स्थित महर्षि वाल्मीकि ने अपने आश्रम में शरण दी थी और यही लव और कुश का ज़न्म हुआ माना जाता है।
महाभारत काल : महाभारत मे भी इस क्षेत्र का उल्लेख सहदेव द्वारा जीते गए राज्यों में प्राक्कोसल के रूप में मिलता है। बस्तर के अरण्य क्षेत्र को कान्तर के नाम से जाना जाता था। कर्ण द्वारा की गई दिग्विजय में भी कोसल जनपद का नाम मिलता है। महाभारतकालीन ऋषभतीर्थ भी बिलासपुर जिले में सक्ती के निकट गुंजी नामक स्थान से समीकृत किया जाता है। इसी प्रकार यह माना जाता हैं कि अर्जुन के पुत्र ‘बभ्रुवाहन’ की राजधानी ‘सिरपुर’ थी जिसे चित्रांगदपुर के नाम से जाना जाता था। इसके साथ ही यह भी माना जाता है कि मनु के पौत्र तथा सुद्युप्न के पुत्र विक्स्वान को यह क्षेत्र प्राप्त हुआ था।

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साभार morchhattigarh

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