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आवारगी

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आवारगी; पर लिखने का मन है, आज, माफ़ करियेगा.मुझे ‘आवारा’ शब्द से इतनी ज्यादा नफ़रत रही है, कि मेरे पापाजी को जब मुझसे अधिकतम विरोध जताना होता है, तो वे इसी शब्द का प्रयोग करते हैं. और वे जानते हैं, कि मै तिलमिला पडूंगा..!

पर मै कैसे यकीन दिलाऊ कि मुझे ‘आवारगी’ से उतना ही प्यार है. मुझे दोनों शब्दों में लगातार फर्क महसूस हुआ, इस हद तक कि मुझे लगता है, कि हर जिंदादिल आवारगी के रंग में ढला होता है…..आवारगी, मतलब खुल पड़ना, दौड़ पड़ना..स्वाभाविकता कि तरफ, बन्धनों की तरफ बागी होना, सच्ची में साँस लेना, पत्तियों को स्पर्श करना, डंठल को छेड़ना, दूब की नोंक ..हथेली में महसूसना..हवा में सरसराना..बाहें फैलाकर उड़ना, अपने में आकाश भर लेना, नन्ही-कोमल बातों पर खिल पड़ना, खुली आँखों से खो जाना….,…., आवारगी इतनी आसान नहीं..!

…. यदि आप चाहते है कुछ मौलिक..तो आवारगी अपनाइए 🙂

“.. बहुत मुश्किल है, बंजारा मिजाजी सलीका चाहिए आवारगी में….”
(निदा फाजली)

यदि आप चाहते है कुछ मौलिक..तो आवारगी अपनाइए. रूसो की जिंदगी क्या विचारक की रही..Noble savage कहा गया उसे . क्योकि रूसो ने पहचाना था आवारगी के सत् को. प्लेटो, यायावर रहा, शादी नहीं की, सुदर्शन था, उन्मुक्त प्रयोगधर्मी रहा..आधुनिक विश्वविध्यालय का माडल सिरजने का श्रेय उसे दीजिये. बच्चन की हाला, आवारगी की चाशनी में बेसुध क्या कई कपाट नहीं खोल देती ..नेहरु की आवारगी, भारत की खोज नहीं करा देती..राहुल संकृत्यायन, वोल्गा का मिलन गंगा से नहीं करा देते..यूरोप का धनाढ्य आवारा अल्फ्रेड, क्या आधुनिक विश्व का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार, नोबेल का हेतु नहीं बनता..बंगला साहित्य , टैगोर का जीवन टटोलिये ना, आवारा मसीहा..शरत बाबू को मत भूलिए…!

आवारगी साहस मांगती है और चाहती है,स्वयं पर अटूट विश्वास. तो क्यों लोग चिल्लाते है; कि आज आँख है पर दृष्टि नहीं है, पांव है पर कोई कदम नहीं उठा सकते, हाथ है पर साथ नहीं दे सकते…! दरअसल हम मूर्ख हैं; कि इतनी तमीज नहीं हम में कि-ठंडी-सरसराती हवा में क्षण भर बह लें, मौसम हो, पर वरिष्ठता का फूहड़ लबादा ओढे हुए है, कि गुनगुना नहीं सकते.. सुबह-सुबह, किसी नई नन्ही पंखुडी पर ओंस की एक बूंद पड़ती है..पंखुडी लचक के खुमारी में हिलती है.. बूंद गिरने को होती है..पर आखिर टिक जाती है..परम पवित्र धवल तो वो होती ही है…!

हमारे पास इतना अवकाश कहाँ; कि हम उस “परम” को इसतरहा यूँ महसूस करें. खुदा तो किताबों में है ना..धर्म के फतवों में, दंगो के मंदिर में, आतंकवाद के चर्च में करता है, गंभीर अठखेलियाँ…गंभीर मूर्खों ने जगत का कितना नुकसान किया है.. सारी स्वाभाविकता सोखकर रुखा-सूखा सिद्धांत सौपा है हमें..जिसकी जुगाली कर हम अपनी कुंठाओं के लिए जरूरी तर्क जुटा लेने में सफल हो ही जाते है..मै तो बड़ा बन ही नहीं पाया..मेरे कुछ स्वयम्भू वरिष्ठ मुझे कहते है-थोडा गंभीर बनो…..स्टूपिड.

गंभीर मूर्खों ने जगत का कितना नुकसान किया है.. सारी स्वाभाविकता सोखकर रुखा-सूखा सिद्धांत सौपा है हमें..जिसकी जुगाली कर हम अपनी कुंठाओं के लिए जरूरी तर्क जुटा लेने में सफल हो ही जाते है

हर दिन बड़ा है, तो मैंने सोचा कि कुछ बहुत छोटी बातें की जाये. जैसे आँख से सही में देखा जाये, नाक से सच्ची में सुंघा जाये, हाथ से रियली में छुया जाये, क्योकि आजकल तो लोग बड़े बुद्धिमान हो गए है आँख से सोचते और दिमाग से देखते है.. कोई पिछडा नहीं हैं भाई..सभी बहुत आगे हैं..धरती पे कोई नहीं है…यु नो …..स्टूपिड .

दर असल हमें पता ही नहीं है, हमें क्या चाहिए ..पर मुझे संतोष है..कुछ आवारगी की जिन्दा मिसालें हमेशा मौजूद रहती हैं, इस संसार में रौशनी दिखाने को. जो मंजनू होंगे..वो तो लपक लेंगे और लेते हैं, लैला को, बाकि तो ड्यूटी ही करते रह जाते है.. सच्ची में अरस्तु ने ठीक ही कहा था- “कुछ लोग ‘गुलाम’ ही पैदा होते है”

ये कैसी सभ्यता है, महामानवों..; कि हम, जब मन करे हँस नहीं सकते, गा नहीं सकते, घूम नहीं सकते, दौड़ नहीं सकते, खेल नहीं सकते…! दरअसल, डंठल में लहराता फूल, सचमुच खुश और सुन्दर लगता है..; जबसे हमारी हवस, उसे तोड़ लेने की हो गयी ना हम अपने डाइनिंग रूम में संसार सजा लेना, सॉरी फिट कर लेना चाहते है. हम मूर्ख लोग हैं. हमें अपनी मूर्खता पर गर्व है. इसका हमारे पास लिखित, ज्ञात और आधिकारिक इतिहास है..जिसे हम मदान्धता में थाती कहते है, उसकी बलिवेदी पर हम अपनी सहजता-स्वाभाविकता चढाकर टाई की नॉट कस लेते है…!

हम वैज्ञानिक लोग है; चुप रहिये, हम पेड़ काटकर लोहा बोते है, स्टील उगाते हैं.., फिर छुरी – काँटों से करीने से सजी तश्तरियों में अपनी हवस डकार लेते हैं, फिर वीकएंड पे भूखे हो जाते है, जंगली; पर वाइल्ड तो अब अच्छा शब्द हो गया है,, माफ़ करियेगा, ड्यूड. …काश एक बार , देह पर मिटटी रगड़कर उसका रोमांच महसूस करते लोग फिर से, हाथ में खुरपी ले, लम्बी प्यारी क्यारियों में नन्हे पौधे रोपते और उनका उगना देखते …बंद कर देते किताबें और बच्चों से कुछ सीख लेते लोग,, कागज गिनना छोड़ .. बिस्तर की सिलवटें ठीक कर लेते.. बंद कमरों में लोहा ढोना छोड़, मोहल्ले में मिलकर कबड्डी खेल लेते, कंपनियों के शेयर गिनना छोड़.. एक बार कम से कम एक बार .. अपने ही बारे में कुछ लिखते..कोई टूटी-फूटी सी मगर भरी-पूरी दो ही लाइन की कविता लिखने का कम से कम जी तो करता….उनका.. जिन पर बड़ा ‘भार’ है…. जगत का. क्योकि वो खास लोग.. गंभीर, बड़े, प्रौढ़ , जिम्मेदार, मैच्योर, समझदार,..हमेशा ही जिन्दा रहने वाले है…मरंगे नहीं.

वो जब पैदा नहीं हुए थे , तो कहाँ धरती पर हवा सर सराती थी, पत्तियां गति थी, नदियाँ नाचती थीं ……..सारा कारोबार उनके जिम्मे है, बड़ा भार है, बहुत बीजी है भाई, बम बनाना है, हथियार खरीदना है, आकाश पे कब्जा करना है ना, चाँद की जमीन तो इन्टरनेट पे आधी बिक चुकी है… वाह रे, महामानवों…!

पर मुझे गर्व है, आवारों पे .

उन्हें कोई जल्दी नहीं है. उनके के पास कौर, रखकर, कूचने-चबाने- लार मिलाकर, रस लेकर निगलने का समय है… मुझे प्यार है उनसे.. और मुझे उम्मीद है उस “परम” को भी इन आवारा उच्छवासों से ही प्यार है, गंभीर बलगमों से नहीं….. सच्ची में माफ़ करियेगा..ज्यादा ही बह गया मै . दर असल प्रैक्टिकल होई नहीं पाया…इतना बड़ा हो गया , भीतर का बच्चा मानता ही नहीं, आदत जाती ही नहीं खिलखिलाने की, मजाक उड़ाने की गंभीरता का लबादा मुझपे फिट बैठता ही नहीं…!

पापा आज मुझे ‘ आवारा’ ही कह दो….. देखिये मै हँस पडूंगा…!

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