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अवलोकितेश्वर( बोधिसत्व) – त्रिलोकीनाथ ही बौद्धों के लिए अवलोकितेश्वर

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भगवान्‌ बुद्ध ने बराबर अपने को मानव के रूप में प्रकट किया और लोगों को प्रेरित किया कि वे उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करें। किंतु उसपर भी हिन्दुधर्म ( ब्राह्मणधर्म) की छाप पड़े बिना नहीं रही। गुप्त काल में बौद्ध धर्म एवं हिन्दुधर्म एक दुसरे के परस्पर प्रभाव में आये| बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की कल्पना उसी का परिणाम है। ब्रह्म के समान ही अवलोकितेश्वर के विषय में लिखा है : ‘अवलोकितेश्वर की आँखों से सूरज और चाँद, भ्रू से महेश्वर, स्कंधों से देवगण, हृदय से नारायण, दाँतों से सरस्वती, मुख से वायु, पैरों से पृथ्वी तथा उदर से वरुण उत्पन्न हुए।’ अवलोकितेश्वरों में महत्वपूर्ण सिंहनाद की उत्तर मध्यकालीन (ल. ११वीं सदी) असाधारण सुंदर प्रस्तरमूर्ति लखनऊ संग्रहालय में सुरक्षित है। अवलोकितेश्वर को अक्सर एक कमल का फूल पकड़े हुए दर्शाया जाता है और कथाओं में उनकी ‘कमल-प्रकृति’ का अक्सर वर्णन मिलता है जो किसी भी वातावरण में प्राणियों को सौंदर्य, सुगंध और उद्धार की ओर ले जाती है।

अवलोकितेश्वर महायान बौद्ध धर्म सम्प्रदाय के सब से लोकप्रिय बोधिसत्वों में से एक हैं। उनमें अनंत करुणा है और धर्म-कथाओं में कहा गया है कि बिना संसार के समस्त प्राणियों का उद्धार किये वे स्वयं निर्वाण लाभ नहीं करेंगे। कहा जाता है कि अवलोकितेश्वर अपनी असीम करुणा में कोई भी रूप धारण कर के किसी दुखी प्राणी की सहायता के लिए आ सकते हैं। महायान बौद्ध ग्रंथ सद्धर्मपुंडरीक में ‘अवलोकितेश्वर बोधिसत्व’ के माहात्म्य का चमत्कारपूर्ण वर्णन मिलता है। चीनी धर्मयात्री फ़ाहियान ३९९ ई॰ में जब भारत आए थे तब उन्होंने सभी जगह अवलोकितेश्वर की पूजा होते देखी।

Avalokiteshvara

त्रिलोकनाथ मंदिर — लाहुल में चंद्रभागा नदी के बाएं तट पर हिंदुओं और बौद्धों के लिए यह मंदिर श्रद्धा का केंद्र रहा है। वास्तुशिल्पीय शैली में मूलतः यह हिंदू मंदिर ही था, लेकिन कालांतर में इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रभाव के बाद इस पर भी उनके धर्म का प्रभाव पड़ा। मंदिर का सफेद शिखर दूर से दिखता है। एक झंडा लहराता दिखाई देता है, जिसके मध्य ओउम् लिखा है। मूलतः श्री त्रिलोकनाथ भगवान का मंदिर कालांतर में बौद्ध तथा हिंदुओं के लिए बराबर महत्त्व का हो गया। मंदिर को चार धामों में से एक तीर्थ की ख्याति प्राप्त है। दूर-दूर से लोग तीर्थ यात्रा पर यहां आते हैं। इनमें तिब्बत और नेपाल के श्रद्धालु भी होते हैं। मंदिर कई चरणों में बना है। ऊपरी भाग ईंटों से ओर निचला भाग पत्थरों से बना है। यह शिखराकार है। मंदिर में भगवान त्रिलोकीनाथ की छह भुजाओं वाली संगमरमर की प्रतिमा है। यह आदमकद है। हिंदुओं के लिए यह श्री त्रिलोकीनाथ और बौद्धों के लिए अवलोकितेश्वर है। बौद्ध परंपरा में जो पूजा पद्धति है, उसके अनुसार अवलोकितेश्वर के आगे दीपक प्रज्वलित रहते हैं। प्रतिमा सुंदर है, जिसके ऊपर सोने का छतर लगा है। इसे एक दूसरे बड़े छतर ने ढक रखा है। इसके ऊपर ही गंगा की एक प्रतिमा है। दायीं तरफ एक मंडप है, इस पर एक बड़ा छतर है, जिसे लोहे की जंजीर से बांध रखा है। सामने गणेश जी की प्रतिमा है।

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