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अंधेरी गुफा की अंधी मछलियों नें अद्भुत बनाया कुटुमसर को

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बस्तर पहुंचने वाले 55 हजार से अधिक देशी- विदेशी पर्यटकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण होता है कोटमसर व कैलाश गुफाओं को देखना। 



क्यों प्रसिद्ध है कुटुमसर की गुफा
कुटुमसर की गुफा जमीन से 55 फुट नीचे हैं। इनकी लंबाई 330 मीटर है। इस गुफा के भीतर कई पूर्ण विकसित कक्ष हैं जो 20 से 70 मीटर तक चौड़े हैं। कांगेर घाटी में स्थित इन भूमिगत गुफाओं का सबसे बड़ा आकर्षण है इनकी आंतरिक संरचना। गुफाओंं के भीतर चूना पत्थर से बनी स्टेक्टेलाइट व स्टेलेग्माईट की झूमरनुमा आकृतियां रौशनी पड़ते ही जगमगा उठती हैं।यह भारत का पहला और दुनिया की सातवीं भूमिगत गुफा है, यह लगभग 35 मीटर नीचे भूमि के स्तर पर स्थित है और लगभग 1371 मीटर लंबा है। यह दुनिया की दूसरी सबसे लंबी प्राकृतिक गुफा है। कुटमसर की गुफाओं को गुपानपाल या कोटमसर गुफाओं के नाम से भी जाना जाता है। 


एक अध्ययन से पता चला है कि करोड़ों वर्ष पूर्व प्रागैतिहासिक काल में बस्तर की कुटुमसर की गुफाओं में मनुष्य रहा करते थे। चूना पत्थर से बनी कुटुमसर की गुफाओं के आंतरिक और बाह्य रचना के अध्ययन के बाद शोधकर्ता कई निष्कर्षों पर पहुंचे हैं। उदाहरण के लिए चूना पत्थर के रिसाव, कार्बन डाईक्साइड तथा पानी की रासायनिक क्रिया से सतह से लेकर छत तक अद्भुत प्राकृतिक संरचनाएं गुफा के अंदर बन चुकी हैं।

गुफा में हैं अंधी मछलियां
पानी से घिरी हुई यह अंधेरी कुटुमसर गुफा, जहां अंधी मछलियां रहती है। यह गुफाएं बहुत पुरानी बनी है और अंधी मछलियों के लिए मशहूर है। जहां सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती जिसके कारण यहां आने वाला व्यक्ति पूरी तरह अंधा महसूस करता है। जिसके कारण यहां कि मछलियों की आखों पर एक पतली सी झिल्ली चढ़ चुकी है, जिससे वे पूरी तरह अंधी हो गई हैं।

गुफा से जुड़ी लोक मान्यता 

भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ, जिसके 12 साल उन्होंने छत्तीसगढ़ में बिताए थे। इस वनवास काल में भगवान राम ने कई साधु-संतों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, तपस्या की। ऐसी मान्यता है कि इस क्षेत्र में वास के दौरान भगवान राम इस गुफा में रुके थे।


कुटुमसर गुफा की ख़ोज

कुटुमसर गुफा छत्तीसगढ़ के बस्तर जिला मुख्यालय जगदालपुर से लगभग 35 किलोमीटर दूर कांगेरघाटी राष्‍ट्रीय उद्यान में स्थित है। यह भारत की सबसे गहरी गुफा मानी जाती है। इस गुफा की गहराई जमीन से 60 -125 फीट तक है। इसकी लंबाई लगभग 4500 फीट है। इसकी खोज प्रोफेसर डॉ शंकर तिवारी ने की थी। कुटुमसर गुफा को सुरुवात में गोपंसर गुफा (गोपन = छिपी) नाम दिया गया था, लेकिन बाद में कुटुमसर गांव के निकट होने के कारण कुटमसार नाम से अधिक लोकप्रिय हो गया। वर्षा ऋतु में इस गुफा के अंदर छोटी नदियां बहती है, जिस कारण इस ऋतु में इस गुफा में प्रवेश करने की मनाही है। कुटुमसर की गुफा भ्रमण हेतु नवम्‍बर से मई तक खुला रहता है।
इस गुफा की खोज 1950 के दशक में भूगोल के प्रोफेसर डॉ शंकर तिवारी ने सीमित संसाधनों और उपकरणों के साथ स्थानीय आदिवासियों की मदत से की। रोमानियाई गुफा विशेषज्ञों की सहायता से 1980 में डॉ. जयंत बिस्वास ने पहली बार गुफा को व्यवस्थित रूप से मापन किया। नक्शा पहले 1990 में बिस्वास के पीएचडी शोध प्रबंध में प्रकाशित हुआ था, और 1992 में उनके द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय स्पीलेयोलॉजिकल सोसाइटी में प्रकाशित हुआ।
इस गुफा के अंदर रंग-बिरंगी अंधी मछलियां पायी जाती है। जिसकी प्रजाति का नाम प्रो.शंकर तिवारी के नाम पर ”केप्‍पीओला शंकराई” नाम दिया गया है

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