Site icon NamasteBharat

असम की लोक- संस्कृति या रीति- रिवाज

असम के लोक- संस्कृति का मूलाधार असम का प्राकृतिक परिवेश और आजीविका हैं। पूर्वोत्तर भारत पहले से ही पर्वत, पहाड़, वन जंगलो से हार- भरा हैं और लोगों की आजीविका वन पर्वतो पर निर्भर हैं। राज्य जिसे प्रकृति ने अपने हाथो से सजाया है एवं सवारा है यहाँ के मैदानी इलाको से लेकर खूबसूरत पहाड़ियों तक चारो और प्रकृति का सौंदर्य ही बिखरा पड़ा हैअसम के लोक- संस्कृति का आधार कृषी हैं आसामी लोग कैसे इस प्रकृति के बीच और प्रकृति के साथ कैसे अपना जीवन यापन करते है कैसे प्रकृति मे रच बस कर अपनी संस्कृति को बनाये रखें हैं। इसके बारे में जानते हैं।

असम के लोक- संस्कृति का इतिहास

महाभारत काल तक असम में अनार्य संस्कृति का प्रचलन था। उसके पहले आर्य का स्थायी निवास इस प्रांत में नहीं था। मिथिला से नरकासुर यहाँ आकर स्थायी रूप से निवास करते थे। नरकासुर के समय में महर्षि वसिष्ठ भी यहाँ आ गये थे। जिसके साथ ही आर्य संस्कृति का आगमन हुआ। ऐसा भी मानना हैं कि महाभारत काल से लेकर सातवीं सदी के मध्य मे भास्करवर्मन के शासनकाल तक यहाँ पर एक ही राजवंश का शासन रहा था। इसकी जानकारी हमें भास्करवर्मन के दुबी और निधानपुर के ताम्रपत्र, नालंदा से प्राप्त वंशावली संबंधी मुद्राओं और बाणभट्ट और ह्वेनसांग के विवरण से मिलती है। रामायण काल तक इस प्रांत का नाम प्रागज्योतिषपुर उसके बाद कामरूप हुआ।

असम का नाम कैसे पड़ा

मध्यकाल में सन् 1228 में बर्मा के एक चीनी विजेता चाउलुंग सिउ का फा ने इसपर अधिकार कर लिया। वह अहोम वंश का था जिसने अहोम वंश की सत्ता यहां कायम की। अहोम वंश का शासन 1829 पर्यन्त तब तक बना रहा। जब तक कि अंग्रेजों ने उन्हे हरा दिया। कहा जाता है कि अहोम राजाओं के कारण ही इसका नाम असम पड़ा। ऐसा देखा गया है कि धार्मिक दृष्टि से यह एक समय शिव की उपासना करने वाला राज्य था परंतु बाद में आर्यो के आगमन के पश्चात् यहाँ एक प्रकार की मिश्रित संस्कृति का विकास हुआ।
असम के लोक- संस्कृति का मूलाधार असम का प्राकृतिक परिवेश और आजीविका हैं। पूर्वोत्तर भारत पहले से ही पर्वत, पहाड़, वन जंगलो से हार- भरा हैं और लोगों की आजीविका वन पर्वतो पर निर्भर हैं।

असम मे घर कैसे होते हैं

चूँकि असम पहाड़- पर्वत, वन- जंगलो से भरा था, तो जंगल में बाँस, लकड़ी बेंत, फुस आदि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे, जिसके कारण इस विशाल प्रांत के लोग रहने के लिए घर बांस, लकड़ी, बेंत और फूस से बना लेते थे, जो की आम तौर पर दो प्रकार के थे। जमीनी और मचान घर । वर्तमान समय में लोग टीन और ईट सीमेंट के मकान कर रहने लगें हैं जिसके कारण बाँस- फूस के घर लोक संस्कृति के पर्याय बन गए हैं।

असम का व्यवसाय क्या है

असम में भी उत्तम शिल्प और कलाकृतियों का खजाना देखने को मिलता है। यहाँ आपको पीतल शिल्प, धातु शिल्प, मुखौटा बनाने, कुम्हार, बेंत और बांस शिल्प, गहने के उत्पादन देखने को मिल जायँगे। असम को दुनिया भर में जाना जाता है अपने रेशम के लिए जिसका नाम असम सिल्क है। एरी नाम के अच्छे ऊन यहाँ देखने को मिल जाते हैं।

असम के लोग मूर्तिकला और विभिन्न कला रूपों जैसे पटुआ और चित्रकारों के बहुत शौकीन होते हैं। मध्ययुगीन काल के समय हस्तीविदारणव, चित्रा भागवत और गीता गोविंदा ने असमिया साहित्य को काफी हद तक प्रभावित किया है। स्थानीय चित्रकारों ने हैंगूल और हैटल जैसे स्थानीय पेंट का भी इस्तेमाल किया है |

असम की जलवायु

असम में आपको भारतीय गर्म एवं शुष्क मौसम नहीं देखने को मिलता है। अगस्त के गर्म महीने में असम का तापमान मध्यम, लगभग 84 डिग्री फ होता है। जनवरी में औसत तापमान 61 डिग्री फारेनहाइट तक रहता है।

इस मौसम में आपको घना कोहरा और बूंदाबांदी देखने को मिलती है। मार्च से बारिश शुरू होती है यह अगस्त या सितमबर तक चलती है वर्षा असम में सबसे ज्यादा होती है । जून से यह बारिश सबसे ज्यादा हो जाती है । चुकी असम एक निचला मैदानी इलाका है जिससे दूसरे नार्थ ईस्ट ऊपरी राज्यों का पानीअसम में आता है |जिसका परिणाम यह होता है की भारी बारिश से असम में हर साल विनाशकारी बाढ़ आ जाती है |

जिससे लाखो लोग प्रभावित होते है | असम के क्षेत्रफल का बीस प्रतिशत भाग वनों से ढका हुआ है।असम में हिरण, हाथी, रॉयल बंगाल के बाघ और जंगली सुअर जंगलों में देखने को मिल जायँगे। महत्वपूर्ण वन उत्पादो की बात की जाय तो लाख, लकड़ी, बांस और जलाऊ लकड़ी प्रमुख हैं |

असम का भौगोलिक रूप

असम भौगोलिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है |असम तीनो साइड से नार्थ ईस्ट राज्यों से घिरा हुआ है | असम उत्तर में भूटान और पूर्व में अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, और मणिपुर द्वारा मिज़ोरम और मेघालय के दक्षिण में और पश्चिम में बांग्लादेश और त्रिपुरा से घिरा पूरी तरह घिरा हुआ है।असम राज्य का चैत्रफल 78,523 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तक फैला हुआ है | असम राज्य मैदानी और नदी घाटियों से मिलकर बना हुआ है|

असम को तीन प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित हुआ है ,जिसमे उत्तर में ब्रह्मपुत्र नदी घाटी, दक्षिण में बराक मैदान और दो और क्षेत्रों को विभाजित करने वाली मकीर एवं कछार की पहाड़ियाँ शामिल है। ब्रह्मपुत्र घाटी असम की प्रमुख विशेषता को दर्शाती है। यह घाटी बांग्लादेश के मैदानों में प्रवेश करने के लिए दक्षिण की ओर मुड़ने से पहले पश्चिम की ओर पूर्वोत्‍तर कोने में असम में प्रवेश होती है एवं पश्चिम में लगभग 450 मील तक फैली हुई है। यह असम की सबसे लम्बी घाटी है |ब्रम्पुत्र नदी घाटी पहाड़ियों एवं लकीरों से जुडी हुई है। पश्चिम को अगर छोड़ दिया जाए तो यह पूरी घाटी पहाड़ों से घिरी है।कछार का मैदान या सूरमा घाटी जलोढ़ अवसाद द्वारा निर्मित हुआ एक समतल उपजाऊ मैदान है जो असम के दक्षिणी भाग में मौजूद है।हम इसे बंगाल डेल्टा का पूर्वी छोर के नाम से जानते है।

असम के लोगो की वेशभूशा

असम में महिला व पुरुष के अलग-अलग पहनावे होते हैं. महिलाओं की ड्रेस में ऊपर का हिस्सा एक विशिष्ट प्रकार का चादर से ढका होता है।असामीज महिलाये इसे कंधे से लेकर कमर तक पहनती है, ज्यादातर चादर सफ़ेद ही होते है जिसमे चादर की पत्तिओ में छोटे छोटे फूल के चित्र बने होते है | असामीज महिलाये कमर से लेकर पाउ तक मेखला पहनती है। मेखला के विभिन्न रंग और डिजाईन होते है । शरीर के छाती अंश में ब्लाउज पहना जाता है।

अस्सामी पुरुषो की वेशभूसा में धोती पहनी जाती है। इसको दराचल कमर से लेकर टांग के आधे हिस्से तक पहनते है। धोती सामान्यत सफ़ेद रंग की होती है।और कुर्ताअस्सामी पुरुष ऊप्परकी और पहनते है यह एक लम्बा कमीज होता है,जिसको गले से लेकर कमर तक पहना जाता है। ज्यादातर अस्सामी लोगो द्वारा सफ़ेद कमीज ही पहना जाता है |

असम के लोगो की वेशभूशा

असम की आहार या भोजन क्या होता है

उत्पादन के आधार पर आहार व खाद्य का निर्धारण होता हैं। असम में प्रचुर बारिश होती है। तो धान इस प्रांत का मुख्य अनाज हैं। अतः इस प्रांत में धान का उत्पादन अधिक होता है पहाड़ों में भी ‘झूम’ पद्धति से धान की खेती करते है। साग- सब्जी, मांस मछली का जुगाड़ और जलाशयों से कर लेते थे। यहाँ अत्यधिक बारिश होने के कारण नद- नदियों की संख्या अधिक है। छोटे- बड़े असंख्य जलाशयों में पर्याप्त मछलियां उपलब्ध रहती हैं जिसके कारण पर्वोत्तर भारत के लोग आम तौर पर मत्स्यभक्षी है और पक्षी जैसे बतख, स्क्वाब आदि बहुत लोकप्रिय हैं, जिन्हें खाने में शामिल किया जाता है
ये भी धीरे- धीरे संस्कृतिक रूप लेने लगे हैं।
असम में विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों के संगम से असमिया भोजन में विविधता और स्वाद काफी बढ़ जाता हैखाना पकाने का पारंपरिक तरीका एवं असम का भोजन अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों जैसे थाईलैंड आदि के समान ही देखा जा सकता है।खाने में तीखा सरसों का तेल उपयोग किया जाता है।असम का पारंपरिक भोजन एक खार के साथ शुरू होता है जो एक टेंगा, एक खट्टा पकवान के साथ समाप्त होता है। भोजन आमतौर पर स्वदेशी समुदाय द्वारा बनाई गई घंटी धातु के बर्तनों में परोसा जाता है। इसके पीछे मान्यता यह है कि जब इस तरह के बर्तनों में भोजन एवं पानी परोसा जाता है तो यह स्वास्थ्य के लिए बेहद अच्छा मन जाता है और इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है । भोजन का अंत तामुल (सुपारी, आम तौर पर कच्चा) और पान के साथ समाप्त होता है।

असम का लोकप्रिय गीत कौन सा हैं

लोक – संगीत गायन

असम लोक संगीत की भी सृष्टि इस प्रकार ही हुई है । असम एक बृहत् राज्य था। सैकड़ो जाति उपजाति के लोग निवास करते थे, जिनकी अपनी अपनी भाषा, संस्कृति, उपासना पद्धति है। असमिया समाज के अलावा करीब 25 जनजातियो के लोग असम में हैं। असमिया समाज में प्रचलित लोक संस्कृति को तीन भागो में विभाजित किया जाता हैं
मध्य असम यानी कामरूप में प्रचलित ‘कारूपी’, निचले असम यानी गोवालापरिया और ऊपरी असम की लोकसंस्कृति।
कारूपी असम का एक बड़ा राज्य था जो विभाजित हो कर बेशक पाँच जिलों में बट गया है परंतु सभी जिलों की लोक – संस्कृति को कामरुपी लोक संस्कृ ही कहा जाता है। यहाँ कृषि पर आधारित लोक गीत प्रचलित है।
विवाह लोक गीत -भारत के सभी वर्गो व स्थानों विवाह गीत प्रचलित है विवाह के समारोह पर हर्षोउल्लास के साथ नाच- गीत का आयोजन होता है असमिया समाज भी इससे अलग नही है यहाँ भी साधरणः महिलाएं विवाह गीत गाती हैं जिनमें शिव पार्वती, राम सीता के गीत लौकिक कथाओ के साथ गाया जाता हैं।
नाम गीत: नाम संस्कृति पूरे असम की लोक संस्कृति है इस नाम गीत को असमिया लोग ताली बजा कर शिव पार्वती राम और कृष्ण के साथ देवी -देवताओं के नाम कीर्तन करते है।
जिकिर- जाकर- मध्य युग में अजानपीर नामक एक सूफी संत ने इस्लाम धर्म के आधार पर कुछ रचना की थी, जिनको जिकिर और जारी कहा जाता है। जो आज भी पूरे असम में प्रचलित है।

नागारा गान-

नागारा गान- इस लोकगान मे नागारा नाम की एक टोली होती है जिसमे पंद्रह- बीस लोग होते है l मुख्य कलाकार ‘पाठक’ कहा जाता है। इसके साथ तीन चार जोड़ा मोरताल और दो जोरा नागारा बजाय जाता है। जोड़े मे एक बड़ा और एक छोटा नागारा होता है। दोनों मिलाकर एक जोड़ा कहा जाता है। अन्य सहयोगियों को पालि कहा जाता हैं, जो गीतों को दुहराते हैं। भागवत पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथो की रोचक कहानियों को कामरुपी बोली मे गया जाता हैं। चार किलोग्राम का भोर ताल बजाकर नाचते हैं नागारा नाम असम का महत्वपूर्ण लोक संस्कृति अनुष्ठान हैं।

नागारा नाम आज भी लोकप्रिय हैं। ये करीब पचास प्रकार के नाम हैं जैसे आइनाम, दिहानाम, हियानाम, जोरानाम,सी जा नाम।

कुशान गान:- ये नाच ,गीत, कथोप कथन और अभिनय का समाहार होता हैं। ‘कुशान’ शब्द लव- कुश से जुड़ा है, इसलिए यह रामायण पर आधारित है। कुशान गान में चौदह- पंद्रह कलाकार होते हैं

असम भारतीय उपमहाद्वीप का विविधताओं से भरा पूर्वांचल राज्य है,जिसमे विभिन्न जनजातीय वर्ग जो आसपास के राज्यों से आये बड़ी संख्या में निवास करते है इसकी वजह से यहाँ बड़ी संख्या में विभिन्न त्यौहार मनाये जाते है जो असम की कला और संस्कृति एवं विविधता को दर्शाते है ।जिसकी वजह से असम त्योहारों का घर कहलाता है ।असम के त्यौहार में जो जुनून, सम्मोहक, मंत्रमुग्ध करने और सच्चे धर्मनिरपेक्षता देखी जा सकती है।

भारीगान
असम के राभस का लकड़ी का नाट्य मुखौटा भारिगान के प्रदर्शन से जुड़ा है, जो एक कम ज्ञात नाट्य नाटक प्रतीत होता है, जिसे असम के राभा समुदाय द्वारा उपयोग किया जाता है। प्रदर्शन स्थानीय लोककथाओं और हिंदू पौराणिक कथाओं के विभिन विषयों पर है।
बिहुगेट
यह बिहू गीत बिहु त्योहार का एक अभिन्न अंग है।
बिहु गीत आम तौर पर एक गीत,वाद्य और नाच ka समाहार है। इसमे अभिनय नही हैं। युवक और युवतियाँ मिलकर नाच गाने मे हिस्सा लेते हैं वर्तमान बिहु गीत और नाच पूरे भारत मे लोकप्रिय हो गया है। रोंगाली बिहू के हुसोरी के दौरान, ग्रामीण, समूहों में, डोर-टू-डोर से चलते हैं, खुशी से गाते हुए कैरोल गाते हैं। इन कोरस समूहों को हसोरी पार्टियों के रूप में भी जानते है और इसमें केवल पुरुष भाग ले सकते थे। फिर वे ढोल नगाड़ों के साथ अपने आगमन का संदेश देते हुए अपने घर के गेट तक पहुँचते हैं। ‘तमुल’ के साथ गृहस्वामी का धन्यवाद करने के बाद गायकों के घर पर नए साल का आशीर्वाद लेते है।

झुमुर
झुमुर गीतों एक पारंपरिक गीत है, जो आम लोगों के दिन-प्रतिदिन के कार्यों पर आधारित है। एड़ियों के चारों ओर घंटियों के बाइंडिंग क्लस्टर की विशेषता के कारण इसको झुमुर के नाम से जानते है।

लोक नृत्य, नाच और लोकनाट्य
पुत्तलिका नृत्य या नाच इस नृत्य या नाच का इतिहास भी प्राचीन है महाभारत के वन पर्व, कथा सारित्सागर, भागवत आदि ग्रंथो मे पुत्तलिका नृत्य या नाच का उल्लेख है। ये केवल नृत्य या नाच नही बल्कि एक सुंदर कहानी भी होती है। इसलिए इसे लोक नृत्य या नाच ही नही लोक नाटक भी कहते है। इसे पाँचालिका विनोद भी कहते है।

ओजापालि – ओजापालि भी असम की प्राचीन लोक- संस्कृति का हिस्सा हैं। इस दल मे छः सात लोग रहते हैं। इसके प्रमुख कलाकार को ‘ओजा’ कहते हैं। इसमें हास्य रसों के माध्य से व्याख्या करते हैं और पालि गीतों को दोहराते हैं।

लोकवादन बड़ ढोल, ढेपाढोल जय ढोल बिहुढोल आदि है।

असम के त्योहार

असम के सभी त्योहारों का उद्देश्य सभी लोगो को एक साथ लाना एवं आपसी प्रेम भाव को बढ़ाना है | असम प्रमुख उत्सवो में बिहू ,रजनी गबरा ,बैशगु,रोंगकर और चोमनकान,माजुली ,देहिंग पटकाई महोत्सव,बोहागियाओ बिशु महोत्सव,बैखो,अंबुबाची महोत्सव,एवं 2 राज्य महोत्स्व हाथी महोत्सव,ब्रह्मपुत्र बीच फेस्टिवल आदि प्रमुख है अगर अन्य त्योहारों की बात करे तो होली ,दीपवाली , क्रिसमस डे ,एवं अन्य बहुत सारे त्यौहार है |

बिहू महोत्सव
असम राज्य में बिहू असम का सबसे प्रमुख त्यौहार है |बिहू वर्ष तीन अलग-अलग समयों में तीन बार मनाया जाता है | अप्रैल में यानी चैत्र महीने के संक्रांति तथा बैसाख महीने के पहले दिन को ‘ बोहाग बिहु’ या रंगाली बिहु’ के रूप में असम के सभी जाति- जनजाति के लोग विभिन्न नामों से मानते हैं। चैत्र संक्रांति को ‘ गुरु बिहु’ अर्थात गाय- बैलों सहित पालतू पशुओं को सम्मान सहित नहा – धुला कर एक प्रकार की पूजा – अर्चना की जाती हैं। असम के गावँ- गावँ, नगरों- शहर में दो महीने तक मंच बनाकर बिहु के नाम पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता हैं।
बिज़ बिहू या रोंगाली बिहू, जनवरी या फरवरी यानी पौष संक्रांति और माघ महीने के प्रथम दिन मेजिजया भेलधार जलाकर धूमधाम से ‘माघ बिहू या भोगली बिहू ‘ नाम से मनाने का नियम हैं। इस पर्व मे खाने – पीने की धूम होती है। खाने की प्रचुरता होने के कारण इसे भोगली बिहु कहते हैं। अक्टूबर एवं नवंबर यानी आश्विन महीने के संक्रांति के दिन शाम को धान की खेती में नैवेद्य अर्पण कर अधिक अनाज उत्पन्न होने के लिए दीपक प्रज्जवलित कर प्रार्थना की जाती है। इस पर्व को कंगाल रूप मे मनाने कारण केला बिहू या कोंगाली बिहू।

रजनी गबरा
रजनी गबरा दिमसा जनजाति के लिए असम के सबसे खास और बहुप्रतीक्षित त्योहारों में से एक माना जाता है , रजनी गबरा एक सामाजिक-धार्मिक त्योहार के रूप में मनाया जाता है यह सामान्यत नई खेती के शुरुवात पहले एवं दिन के समय मनाया जाता है |

बैशगु

बैशगु का त्योहार आम तौर पर मध्य अप्रैल के दौरान बोडो कचरिस जनजाति के द्वारा मनाया जाता है। बोडो जनजाति नए साल पर वसंत के मौसम में इस त्योहार को मनाती है |

माजुली
माजुली का त्योहार असम में नदी के किनारे पर मनाया जाता है , जो एक असीम प्राकृतिक सुंदरता को दर्शाता है | की पृष्ठभूमि है। जिसमे अलग-अलग जातीय समूहों एक छत निचे अपनी संस्कृति और विरासत के लिए मिलते है |

देहिंग पटकाई महोत्सव

यह त्यौहार हर साल जनवरी के महीने में आयोजित किया जाता है। इन त्योहारों को जातीय मेलों, चाय विरासत यात्राओं, गोल्फ, वन्यजीव भ्रमण, साहसिक खेलों और विश्व युद्ध II कब्रिस्तान और स्टिलवेल रोड के लिए डाउन लेन लेन यात्राओं के एक प्रमुख कॉकटेल के रूप में मनाया जाता है |

Exit mobile version