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‘राज’ करने को ‘विकास’ की ‘नीति’ भाती है योगी को

गोरखपुर। राजनीति करने का यह अलग अंदाज ही उन्हें सीधे जनता से जोड़ता है। 19 साल तक सांसद रहे तो, और अब तीन साल से राज्य के मुखिया हैं, तो भी। प्राथमिकता सिर्फ विकास। सत्ता से दूर रहे तो इसी मुद्दे पर संघर्ष। सत्तारूढ़ हुए तो इसी पर परिणामजन्य विमर्श। राजनीति को भले ही साम, दाम, दंड, भेद का चौसर समझा जाता हो लेकिन देश के सबसे बड़े राज्य के नेतृत्वकर्ता को इसका एक ही सिद्धान्त और वही व्यवहार पक्ष समझ आता है, निष्पक्ष विकास। इन बातों से इतना तो आप समझ ही गए होंगे कि जिक्र किसका हो रहा है। बिल्कुल सही समझा आपने, बात उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ही हो रही है, जिन्हें राजनीति में ‘राज’ करने को सिर्फ ‘विकास’ की ‘नीति’ ही भाती है।

सीएम योगी की विकासपरक सियासी कार्यशैली गोरखपुर में गुरुवार को उनके विरोधियों को निरुत्तर कर गई। गोरखपुर महानगर क्षेत्र और सहजनवा के लिए 122 करोड़ रुपये की 175 परियोजनाओं की सौगात देकर उन्होंने बुनियादी सुविधाओं की हर व्यक्ति तक सुनिश्चितता के अपने एजेंडे को और आगे बढ़ाया। यह योगी का जनमानस से जुड़ाव ही था कि बीते 8 अक्टूबर को वर्चुअल शिलान्यास समारोह से जुड़े लोगों को ‘एक्चुअल’ और अनौपचारिक संवाद का आनंद आ रहा था। ऑनलाइन कार्यक्रम में सीएम ने सभी जनप्रतिनिधियों, पूर्व जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ नागरिकों को भी आमंत्रित कराया था। नागरिकों को सीधे प्रसारण से जोड़ने के लिए कई स्थानों पर स्क्रीन का इंतज़ाम था। सीएम एक बार जुड़े तो लगा कि वह लखनऊ नहीं बल्कि इसी शहर में मौजूद हैं, विकास को लेकर संवाद का सिलसिला शुरू हुआ तो वक्त का पता ही नहीं चला। खुद योगी ऐसी रौ में थे, गोया गोरखपुर में ही हैं तो समय की फिक्र क्यों।
सीएम ने विकास की सौगात दी तो यह नहीं देखा कि वार्ड किस दल के प्रतिनिधित्व में है, जितनी आवश्यकता, उसमें कोई समझौता नहीं। भले ही वार्ड में पार्षद किसी दल का हो। गुरुवार को इस कार्यक्रम के जरिये योगी ने गत दिनों भरी बरसात में अपने ही दल में एक दूजे को बल दिखाने वाले कुछ नेताओं को भी आईना दिखा दिया कि उनकी प्राथमिकता सिर्फ विकास कार्य हैं और उन्हें श्रेय लेने या दूसरे की टांग खींचने वाली राजनीति से कोई मतलब नहीं है। शिलान्यास के हफ्ते भीतर तकरीबन सभी कार्य धरातल पर शुरू भी हो गए हैं।


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